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कथक समारोह में पुनर्जीवित हुई जयपुर घराने की परम्परा

देश के तीन कथक घरानों में से एक जयपुर कथक घराने की कथक शैली शनिवार शाम जोधपुर के टाउन हॉल में पुनर्जीवित करने का प्रयास किया गया।

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जोधपुर

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MI Zahir

Jul 01, 2018

Kathak Dance

Kathak Dance

जोधपुर.

देश के तीन कथक घरानों में से एक जयपुर कथक घराने की कथक शैली शनिवार शाम टाउन हॉल में पुनर्जीवित करने का सफ ल प्रयास किया गया। अवसर था जयपुर कथक केन्द्र व राजस्थान संगीत नाटक अकादमी की मेजबानी में कथक समारोह का।

कार्यक्रम के प्रथम चरण में अद्र्ध सरकारी संस्थान जयपुर कथक केंद्र की डॉ. रेखा ठाकुर के निर्देशन में उनके शिष्यों चेतनकुमार देवरा, भवदीप कुमार, तोशिबा गोठरवाल, देवांशी दावे, कनिका कोठारी, शगुन शर्मा, चित्रांश तंवर व आनंद दलवी आदि ने गणेश वंदना, परम्परागत थाट, आमद, परण, ताल धमाल, ठुमरी और द्रुत तीन ताल सहित परम्परागत भजन 'भज रघुवर श्याम चरण की प्रस्तुति दी। जयपुर कथक घराने की पांचवीं पीढ़ी के सदस्य होने का दावा करने वाले पंडित राजकुमार जबड़ा ने शंकर स्तोत्र की प्रस्तुति दी। सारंगी पर उस्ताद मोइनुद्दीन खान ने संगत की। तबले पर हनुमान भारती थे। पखावज वादन डॉ. प्रवीण आर्य ने किया। सितार पर पंडित हरिशरण भट्ट थे। गायन मुन्नालाल भाट ने किया।

कार्यक्रम की शुरुआत में अकादमी सचिव महेश पंवार, जयपुर कथक केंद्र सचिव और आचार्य डॉ. रेखा ठाकुर, पूर्व अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक कल्याणसिंह राठौड़ ने नटराज की मूर्ति के समक्ष दीप प्रज्वलित किया।

यह है कथक

कथक नृत्य उत्तर प्रदेश का शास्त्रीय नृत्य है। कथक कहे सो कथा कहलाए। कथक शब्द क अर्थ कथा को थिरकते हुए कहना है। प्राचीन काल मे कथक को कुशिलव के नाम से जाना जाता था। कथक राजस्थान और उत्तर भारत की नृत्य शैली है। यह बहुत प्राचीन शैली है क्योंकि महाभारत में भी कथक का वर्णन है। मध्य काल में इसका सम्बन्ध कृष्ण कथा और नृत्य से था। मुसलमानों के काल में यह दरबार में भी किया जाने लगा। वर्तमान समय में बिरजू महाराज इसके बड़े व्याख्याता रहे हैं। हिन्दी फिल्मों में अधिकतर नृत्य इसी शैली पर आधारित होते हैं।

कथक : एक नजर
भारत के आठ शास्त्रीय नृत्यों में से सबसे पुराना कथक नृत्य है। इसकी उत्पत्ति उत्तर भारत में हुई। कथक एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ कहानी से व्युत्पन्न करना है। यह नृत्य कहानियों को बोलने का जरिया है। इस नृत्य के तीन प्रमुख घराने हैं। कछवा के राजपूतों की राजसभा में जयपुर घराने का नृत्य, अवध के नवाब के राजसभा में लखनऊ घराने का और वाराणसी की सभा में वाराणसी घराने का जन्म हुआ। अपनी-अपनी विशिष्ट रचनाओं के लिए प्रसिद्ध एक कम प्रसिद्ध रायगढ़ घराना भी है।

कथक : नृत्य प्रदर्शन
नृत्त वंदना, देवताओं के मंगलाचरण के साथ शुरू किया जाता है।
ठाट, एक पारंपरिक प्रदर्शन जहां नर्तकी सम पर आकर एक सुंदर मुद्रा में खड़ी होती है।
आमद, अर्थात प्रवेश तालबद्ध बोल का पहला परिचय होता है।
सलामी, मुस्लिम शैली में दर्शकों के लिए एक अभिवादन होता है।
कवि, कविता के अर्थ नृत्य में प्रदर्शित किया जाता है।
पडऩ, एक नृत्य जहां केवल तबले का नहीं, बल्कि पखवाज का भी इस्तेमाल किया जाता है।
परमेलु, एक बोल या रचना है, जहां प्रकृति का प्रदर्शन होता है।
गत, यहां सुंदर चाल-चलन दिखाया जाता है।
लड़ी, बोलों को बाटते हुए तत्कार की रचना।
तिहाई, एक रचना जहां तत्कार तीन बार दोहराई जाती है और सम पर नाटकीय रूप से समाप्त हो जाती है।

कथक नृत्य भाव
नृत्य भाव को मौखिक टुकड़े की एक विशेष प्रदर्शन शैली में दिखाया जाता है। मुगल दरबार में यह अभिनय शैली की उत्पत्ति हुई। इसकी वजह से यह महफिल या दरबार के लिए अधिक अनुकूल है ताकि दर्शक कलाकार और नर्तकी के चेहरे की अभिव्यक्त की हुई बारीकियां देख सके। ठुमरी गाई जाती है और इसमें चेहरे, अभिनय और हाथ के साथ व्याख्या की जाती है।