
राजस्थान के इस जिले में कड़वी निंबोली से होता है घर का खाना नमकीन, रिश्तों में घुलती है मिठास
आशीष बाजपेयी. बांसवाड़ा. जिले के कई गांवों में आज भी ‘वस्तु विनिमय’ पद्धति आज भी कायम है। यह पद्धति लोगों के आपसी संबंधों और रिश्तों में मिठास घोलने का भी माध्यम है। इसी को अपनाकर जिले के ग्रामीण अंचल में कई परिवार ऐसे हैं जो वस्तु-विनिमय के माध्यम से अपनी जरूरत का सामान लेकर जीवन निर्वाह कर रहे हैं। ऐसा ही कुछ नीम की निंबोली के साथ है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार निंबोली के बदले नमक की जरूरत को पूरा कर रहे हैं।
पूरा परिवार बिनता है निंबोली
गर्मी के मौसम में नीम की निंबोली को एकत्रित करने के लिए गांवों में पूरा परिवार जुटता है। बड़े-बुजुर्ग से लेकर बच्चे तक नीम के पेड़ों के नीचे से निंबोली एकत्रित करते हैं। इसके बाद परिवार का सदस्य बाजार में निंबोली देकर आखा नमक लेकर आता है।
इसलिए लाते हैं नमक
निंबोली के बदले नमक लेने की बाध्यता नहीं है। वस्तु विनिमय में समान कीमत की वस्तु ही बदले में मिलती है। व्यापारी निंबोली की कीमत 5 से 6 रुपए प्रति किलो लगाते हैं। बाजार में आखा नमक की कीमत भी इतनी ही है। इस कारण लोग निंबोली के बदले नमक लेते हैं, ताकि इसका दैनिक उपयोग हो सके। आंबापुरा और आसपास के क्षेत्र में वस्तु विनिमय की पद्धति का चलन ज्यादा है।
हमारी तो मजबूरी
गणाऊ के ललिया ने बताया कि वो लम्बे समय से निंबोली देकर नमक लाते हैं। जिससे परिवार और मवेशियों की जरूरत का नमक पूरा होता है। तकरीबन एक-डेढ माह तक निंबोली बिनते हैं और उसे देकर नमक ले आते हैं। उन्होंने कहा कि मेरा परिवार ही नहीं, आसपास गांवों के लोग भी ऐसे ही नमक लाते हैं।
नमक और निंबोली की भरमार
इन गांवों में निंबोली से नमक बदलने का चलन इस कदर हावी है कि छोटी-छोटी दुकानों पर नमक और निंबोली के ढेर लगे हैं। दुकानदारों ने बताया कि दिन में तकरीबन 50 किलो या उससे ज्यादा नमक के बदले निंबोली देते हैं।
Published on:
04 Jul 2018 03:52 pm
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