
Kangil War Vijay Divas: शहीद की पत्नी लोगों के घरों में काम करने को हुई मजबूर, सभी ने दुत्कारा
कानपुर. पाकिस्तानी घुसपैठियों ने कारगिल की पहाड़ियों पर कब्जा कर लिया। इसकी भनक जब भारतीय सेना को हुई तो उन्हें खदेड़ने के लिए सेना ने ऑपरेशन विजय चलाया। आज ही के दिन सेना ने पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़कर भारतीय जमीन से बाहर किया था, जिसे हर साल कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। ऑपरेशन विजय नाम के इस मिशन में भारत माता के सैकड़ों सपूत शहीद हुए थे। इन वीर सपूतों ने अपनी जान की परवाह किए बिना देश की आन-बान-शान के लिए इस जंग में अदम्य साहस एवं वीरता का परिचय दिया। देश की सुरक्षा पर अपने प्राण न्यौछावर करने वालों में कानुपर के सपूत भी पीछ नहीं हटे। कारगिल युद्ध के दौरान नौबस्ता खाड़ेपुर निवासी शहीद विजय पाल यादव दुश्मनों की गोलियों की परवाह किए बिना आगे बढ़ते गए, जो उनके रास्ते में आया उसे मौत के घाट उतारते गए। इसी दौरान उनके शरीर पर कई गोलियां लग गईं और भारत माता का ये सपूत शहीद हो गया। शहीद के पार्थिक शरीर पर फूल माल्यापर्ण करने के लिए कई राजेनेता आए और कई वादे किए, लेकिन वह आज तक जमीन पर नहीं दिखे। विजय दिवस के पर्व पर एक भी सरकारी अफसर शहीद विधवा की सुध लेने नहीं गया।
कारगलि रखा पेट्रोल पंप का नाम
पाकिस्तानी सेना और आंतकवादियों ने कारगिल की पहाड़ियों पर कब्जा कर लिया। दुश्मनों को इन पहाड़ियों से खदेड़ने के लिए सेना ने ऑपरेशन विजय चलाया। आज के ही दिन सेना ने पाकिस्तान को खदेड़कर कारगिल युद्ध फतह किया था। कारगिल युद्ध में शहीद हुए जवान विजय पाल की पत्नी सुषमा यादव को सरकार ने सन 2000 में पेट्रोल पम्प आवंटित किया था। सुषमा ने इसे भारतीय सेना को समर्पित करते हुए इसका नाम कारगिल विजय पेट्रोल पम्प रखा। पांच साल बाद ही पेट्रोलियम कंपनी ने तकनीकि आधार पर पेट्रोल पम्प सीज कर दिया और अल्प शिक्षित सुषमा कुछ समझ भी नहीं पाईं।पेट्रोल पंप बंद होने के बाद वह परिवार समेत सड़क पर आ गईं। इस दौरान शहीद की बेवा ने दूसरों के घरों पर काम किया। सुषमा बताती हैं कि कई बड़े नेताओं के पास जाकर मैंने फरियाद की, लेकिन सबने हमें दुत्कार कर भगा दिया।
12 साल के बाद मिली जीत
शहीद विजय पाल तो कारगिल की चोटियों में लड़ते-लड़ते शहीद हो गए, लेकिन उनके जाने के बाद परिवार 12 साल तक सरकारी तंत्र से लड़ता रहा। शहीद के-साले विनय कुमार यादव ने बताया कि हम और दीदी लखनऊ से लेकर दिल्ली तक अपनी फरियाद लेकर गए, पर कहीं सुनवाई नहीं हुई। 12 साल तक हमने ये लड़ाई लड़ी और कोर्ट के निर्णय के बाद हमारी जीत हुई। शहीद की पत्नी कहती हैं कि नेता अफसर मौज करते रहे और हमारी नन्हीं बेटी को कई रातें भूखे सोकर गुजारनी पड़ी। अब कारगिल युद्ध के शहीद का यह परिवार बार-बार एक ही बात कह रहा है कि जो दुख उन्होंने भोगा है, वह किसी अन्य शहीद परिवार को न भोगना पड़े।
1997 में सेना में भर्ती हुए थे विजय पाल
विजय पाल यावव का जन्म फतेहपुर के अमौली ब्लॉक के झाऊपुर गांव में किसान के घर पर 1976 में हुआ था। उन्होंने आइर्श इंटर कॉलेज से हाईस्कूल के साथ ही इंटरमीडियट की पढ़ाई करने के दौरान इनका चयन 1997 में सेना में हो गया। दो साल की नौकरी के दौरान इन्हें दूसरी बार कश्मीर में जाने का मौका मिला। विजय पाल कारगिल युद्ध के दौरान शहीद हो गए। वह तीन भाईयों में सबसे बड़े थे। विजय पाल की बुआ के लड़के बृजेश पाल कहते हैं कि वह बचपन से ही सेना में जाने का प्रण किए हुआ था। पहली भर्ती कानपुर कैंट में हुई और इसका सिलेक्शन हो गया। विजय पाल यादव स्कूली स्तर की क्रिकेट प्रतियोगिताओं में भी भाग लेते थे। गांव में बने शहीद स्मारक के बगल में ही इनके नाम से गांववालों ने एक क्रिकेट मैदान का निर्माण भी करवाया है।
Updated on:
26 Jul 2018 01:54 pm
Published on:
26 Jul 2018 01:47 pm

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