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बिखरी पड़ी है पुरा संपदा, धणी-धोरी नहीं

9वीं से 12वीं सदी तक के प्रस्तर शिल्प का प्रतिनिधित्व करता वास्तु एवं शिल्पकला का अद्भुत संगम

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बिखरी पड़ी है पुरा संपदा, धणी-धोरी नहीं

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हरनावदाशाहजी. 9वीं से 12वीं सदी तक के प्रस्तर शिल्प का प्रतिनिधित्व करता वास्तु एवं शिल्पकला का अद्भुत संगम भले ही क्षेत्र के लोगों के लिए आस्था व आकर्षण का केंद्र है, लेकिन विभागीय उपेक्षा के चलते यहां पर न तो इस प्राचीन संपदा की सार-संभाल हो रही है और न ही सुरक्षा। होमगार्ड के जवानों के सहारे सुरक्षा व्यवस्था कितनी कारगर साबित हो रही है इसका प्रमाण हाल ही के दिनों में हुई मंदिर की दानपेटियों को तोड़कर चोरी की घटना है। जिसमें लाख रुपए से अधिक की दान की राशि अज्ञात चोर चुरा ले गए।
परवन नदी तट के किनारे स्थित काकोनी का प्राचीन नाम कांतापुरी था। जिसमें बड़ी संख्या में मंदिरों का समूह दबा पड़ा है। यहां की 15 फीट ऊंची विशाल प्रतिमा जहां लोगों की आस्था का केंद्र है तो वहीं विशाल शिवलिंग भी विशेष आकर्षण का केंद्र बना है, लेकिन इन प्रतिमाओं के आस-पास बिखरी पड़ी कलात्मक मूर्तियों के अवशेष यहां पहुंचने वाले लोगों में एक जिज्ञासा बढ़ाते नजर आते है। वामन नारायण घीया जैसे अंतरराष्ट्रीय तस्करों की नजरें भी यहां से मूर्तियों को तस्करी कर विदेश पहुंचाने तक में सफल रही है, लेकिन उसके बाद भी यहां की सुरक्षा व्यवस्था मानों खानापूर्ति मात्र ही नजर आती है।
नहीं है कोई इंतजाम
क्षेत्र का सबसे महत्वूर्ण पिकनिक स्थल होने के बावजूद इंतजाम के नाम पर यहां पर कुछ नजर नहीं आता। बरसात के दिनों में परवन नदी में पानी का जबरदस्त बहाव रहता है और उसी दौरान पिकनिक मनाने वालों की भीड़, लेकिन घाटी वाले इस क्षेत्र में सुरक्षा के इंतजाम के नाम पर कुछ भी नहीं है। होम गार्ड के जवान एक छोटी सी क्वार्टर में रहते है जिनके पास भी सुरक्षा के लिए एक लाठी का सहारा होता है। ऐसे में बेशकीमती धरोहर की सुरक्षा तो मानों भगवान भरोसे ही चल रही है। पिछले पांच दस सालों में यहां से मूर्तियां चोरी चली भी गई हो तो उनका कोई रिकॉर्ड नहीं है। क्योंकि क्योंकि बडी मात्रा में क्षेत्र में फैली पुरा संपदा को सहेजने के बाद ही इसका पता चल पाता है। ऐसे में पिछले एक दशक से यहां हुई चोरी का कोई मामला पुलिस तक नहीं पंहुचा है लेकिन बेजोड कलात्मक पुरासंपदा की हो रही उपेक्षा लोगों के मन को व्यथित जरुर कर रही है। विभागीय अधिकारी भी शायद ही इधर का रुख करते है जबकि जिले से दूरदराज होने के कारण आज भी सार संभाल के साथ जीर्णोद्धार की बांट जोह रहा है।