
दोपहर सडक़ के समीप ही 3-4 नीलगायों का एक झुंड चहलकदमी करता हुआ दिखाई दिया।
नीलगाय वैसे तो सूखे और पर्णपाती वनों में ही फलते-फूलते हैं। ये मुख्यत: राजस्थान, मध्यप्रदेश के कुछ भाग, दक्षिणी उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा और आन्ध्रप्रदेश में पाई जाती हैं। इसकी गिनती हरिणों की सबसे विशाल प्रजाति में होती है। अब इनका कुनबा कवाई कस्बे के आसपास भी अधिक मात्रा में देखा जाने लगा है। कस्बे से होकर निकलने वाले नेशनल हाइवे सडक़ के समीप स्थित वन विभाग की भूमि पर अंग्रेजी बबूल की झाडिय़ों के बीच इनका कुनबा विचरण करते आसानी से देखा जा सकता है। दोपहर सडक़ के समीप ही 3-4 नीलगायों का एक झुंड चहलकदमी करता हुआ दिखाई दिया। जिसे इस सडक़ से निकलते हुए कमरे में कैद किया गया। उस वक्त नीलगाय का झुंड हरे पेड़ों की पत्तियां चरने में मगन था जैसे कि वे जंगल में हों।
नाम जैसा नहीं दिखाता
वास्तव में नीलगाय इस प्राणी के लिए उतना सार्थक नाम नहीं है। क्योंकि मादाएं भूरे रंग की होती हैं। नीलापन वयस्क नर के रंग में पाया जाता है। वह लोहे के समान सलेटी रंग का अथवा धूसर नीले रंग का शानदार जानवर होता है। उसके आगे के पैर पिछले पैर से अधिक लम्बे और बलिष्ठ होते हैं, इससे उसकी पीठ पीछे की तरफ ढलवां होती है। नर और मादा में गर्दन पर अयाल होता है। नरों की गर्दन पर सफेद बालों का एक लम्बा और सघन गुच्छा रहता है और उसके पैरों पर घुटनों के नीचे एक सफेद पट्टी होती है। नर की नाक से पूंछ के सिरे तक की लम्बाई लगभग ढाई मीटर और कन्धे तक की ऊंचाई लगभग डेढ़ मीटर होती है। उसका वजन 250 किलो तक होता है। मादाएं आकार में कुछ छोटी होती हैं। केवल नरों में छोटे, नुकीले सींग होते हैं जो लगभग 20 सेण्टीमीटर लम्बे होते हैं।
मृग उन जन्तुओं को कहा जाता है, जिनमें स्थायी सींग होते हैं, यानी हिरणों के शृंगाभों के समान उनके सींग हर साल गिरकर नए सिरे से नहीं उगते। नीलगाय दिवाचर (दिन में चलने-फिरने वाला) प्राणी है। वह घास भी चरती है और झाडिय़ों के पत्ते भी खाती है। मौका मिलने पर वह फसलों पर भी धावा बोलती है। उसे बेर के फल खाना बहुत पसन्द है। महुए के फूल भी बड़े चाव से खाए जाते हैं। अधिक ऊंचाई की डालियों तक पहुंचने के लिए वह अपनी पिछली टांगों पर खड़ी हो जाती है। उसकी सूंघने और देखने की शक्ति अच्छी होती है, परन्तु सुनने की क्षमता कमजोर होती है। ऊबड़-खाबड़ जमीन पर भी वह घोड़े की तरह तेजी से और बिना थके काफी दूर भाग सकती है। वह घने जंगलों में भूलकर भी नहीं जाती। सभी नर एक ही स्थान पर आकर मल त्याग करते हैं, लेकिन मादाएँ ऐसा नहीं करतीं। ऐसे स्थलों पर उसके मल का ढेर इक_ा हो जाता है। ये ढेर खुले प्रदेशों में होते हैं, जिससे कि मल त्यागते समय यह चारों ओर आसानी से देख सके और छिपे परभक्षी का शिकार न हो जाए।
किसानों और फसलों के लिए समस्या
अक्सर नीलगाय और रोजड़ों को किसानों व फसलों का दुश्मन माना जाता है। क्योंकि ये अक्सर खेतों पर धावा बोलकर फसल को न केवल चट कर जाते हैं, बल्कि बर्बाद भी कर देते हैं। यह समस्या राजस्थान और उत्तर प्रदेश के किसानों को अधिक भुगतनी पड़ती है, यह फसलों को नुकसान पहुंचाती है।
ऐसी होती है नीलगाय
नीलगाय को रोजड़ा भी कहा जाता है। यह हरिण परिवार के सबसे विशालकाय सदस्यों में गिना जाता है। नीलगाय एक बड़ा और शक्तिशाली जानवर है। कद में नर नीलगाय घोड़े जितना होता है, पर उसके शरीर की बनावट घोड़े के समान सन्तुलित नहीं होती। शरीर का पिछला हिस्सा अपेक्षाकृत कम ऊंचाई का होने से यह दौड़ते समय अटपटा लगता है। अन्य मृगों की तेज चाल भी उसे प्राप्त नहीं है। इसलिए वह बाघ, तेन्दुए और जंगली कुत्तों का आसानी से शिकार हो जाता है। यद्यपि एक बड़े नर को मारना बाघ के लिए भी आसान नहीं होता। छौनों को लकड़बग्घे और गीदड़ उठा ले जाते हैं। परन्तु कई बार उसके रहने के खुले, शुष्क प्रदेशों में उसे किसी भी परभक्षी से डरना नहीं पड़ता, क्योंकि वह बिना पानी पीये बहुत दिनों तक रह सकता है। जबकि परभक्षी जीवों को रोज पानी पीना पड़ता है। इसलिए परभक्षी ऐसे शुष्क प्रदेशों में कम ही जाते हैं।
Published on:
07 Nov 2023 12:33 pm
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