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भाव नहीं बढ़ने से अफीम की खेती बनी घाटे का सौदा, मजदूरी भी पड़ रही भारी

Baran News : कभी गांव में रुतबे और अच्छी कमाई का सौदा माने जाने वाली अफीम की फसल आज अफीम किसानों के लिए घाटे का सौदा बन गई है। कड़ी मेहनत और हजारों रुपए खर्च करने के बाद भी किसान अपनी लागत भी नहीं निकाल पा रहा है।

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बारां

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Kirti Verma

Feb 26, 2024

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Baran News : कभी गांव में रुतबे और अच्छी कमाई का सौदा माने जाने वाली अफीम की फसल आज अफीम किसानों के लिए घाटे का सौदा बन गई है। कड़ी मेहनत और हजारों रुपए खर्च करने के बाद भी किसान अपनी लागत भी नहीं निकाल पा रहा है। लगातार घाटे का सौदा बन रही अफीम की फसल को लेकर अब अफीम काश्तकार इससे कतराने भी लगे हैं। कई अफीम काश्तकार तो पट्टे मिलने के बाद भी इसकी खेती नहीं कर रहे हैं। लंबे समय से सरकार ने अफीम के भाव नहीं बढ़ाए, जबकि खर्चा दिनों-दिन बढ़ने से किसानों का मुनाफा लगातार कम हो रहा है। इसके बावजूद कई किसान अब भी अगले साल फायदा होने की उम्मीद में इसकी खेती जारी रखे हुए हैं।

अफीम की सरकारी दर कम है कारण
किसान को दिए जाने वाले 10 आरी के पट्टे में कुल खर्च 50 हजार रुपए के करीब आता है, लेकिन इसके एवज में काश्तकार को लगभग 40-50 हजार रुपए की ही कमाई ही हो पाती है। अफीम काश्तकार को सरकार काश्तकारों को अच्छी किस्म की अफीम और अच्छी औसत देने पर प्रति किलो अफीम का 1000 से 2500 रुपए तक भुगतान करती है। ऐसे में किसान को इससे 12 से 15 हजार रुपए की आय होती है। इसके साथ ही पोस्त दानों से किसानों को लगभग 50 हजार रुपए तक की आमदनी हो जाती है।

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अन्य खर्चे भी बढ़े
अफीम की चिराई, लुवाई, निराई, गुडाई, मजदूरी, दवा और बीज पर लगभग 50 हजार रुपए खर्च हो जाते हैं। लगातार बढ़ रही मजदूरी के कारण यह खर्च भी बढ़ता जा रहा है। इसके साथ ही कई बार पानी की कमी पर टैंकर से पिलाई करनी पड़ती है। इस पर भी लगभग 2 हजार रुपए तक खर्च आता है। इससे किसानों को 8 से 10 हजार रुपए तक घाटा उठाना पड़ रहा है।

पूर्व में सरकार 125 रुपए किलों के हिसाब से अफीम डोडा-चूरा खरीदती थी, जिससे किसानों को करीब 12 से 15 हजार रुपए मिलते थे, जिससे उनका खर्च निकल जाता था। इसके साथ ही पूर्व में अफीम की उपजे के पट्टे भी ज्यादा आरी के होने के कारण किसानों को कुछ मुनाफा हो जाता था, लेकिन पिछले वर्ष से पट्टे भी 10 आरी के कर दिए जाने से किसानों का नुकसान बढ़ गया है।

कभी मानी जाती थी गांव में रुतबे और लाभ का सौदा
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