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अफीम नीति की घोषणा में देरी से किसानों में बढ़ रहा आक्रोश

किसानों ने बताया कि अफीम फसल नीति जारी होने के बाद किसान अफीम फसल की बुआई कर सकेगा।

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बारां

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Mukesh Gaur

Oct 29, 2024

किसानों ने बताया कि अफीम फसल नीति जारी होने के बाद किसान अफीम फसल की बुआई कर सकेगा।

किसानों ने बताया कि अफीम फसल नीति जारी होने के बाद किसान अफीम फसल की बुआई कर सकेगा।

विधायक ने की केंद्रीय वित्त मंत्री को पत्र लिख शीघ्र नीति जारी करने की मांग

छबड़ा. बारां जिले के छबड़ा-छीपाबड़ौद एवं अटरू के हजारो अफीम काश्तकारों को केंद्र सरकार की ओर से जारी की जाने वाली अफीम फसल नीति 2024-25 का इंतजार हैं। अफीम फसल नीति की घोषणा अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में शुरु हो जाने के बावजूद घोषित नहीं हो पाई है। साथ ही अफीम फसल नीति देरी से जारी होने पर अफीम उत्पादन में भी इसका असर दिखाई दे सकता हैं। केंद्र सरकार सितंबर माह में अफीम फसल नीति जारी कर देती हैं, लेकिन इस बार देरी हो रही हैं। विधायक प्रताप सिंह सिंघवी ने केंद्रीय वित्त मंत्री को पत्र लिखकर अविलम्ब अफीम फसल नीति जारी करने की मांग की हैं।

विधायक सिंघवी ने बताया कि अफीम उत्पादन के क्षेत्र में छबड़ा-छीपाबड़ौद अग्रणी है। नीति घोषित नहीं होने से अफीम उत्पादक किसान ङ्क्षचतित हैं। वर्तमान में अफीम की फसल को बोये जाने का समय प्रारंभ हो गया है, परंतु इस वर्ष अफीम फसल नीति की घोषणा अभी तक नहीं हुई है, इसके कारण अफीम उत्पादक किसान अफीम फसल को बोये जाने को लेकर असमंजस में है। प्रतिवर्ष अफीम फसल नीति सितंबर माह में घोषित हो जाती है ताकि निर्धारित समय पर अफीम उत्पादक किसान फसल बोकर अच्छा परिणाम आने की आशा करता है।

पॉलिसी के बाद मिलती हैं बुवाई की परमिशन

अफीम किसानों ने बताया कि अफीम फसल नीति जारी होने के बाद किसान अफीम फसल की बुआई कर सकेगा। पॉलिसी जारी होने के बाद अफीम किसानों को कागजी कार्यवाही पूरी करने के बाद विभाग द्वारा अफीम बुआई की परमिशन दी जाती हैं। यहां भी बड़े पैमाने पर अफीम फसल की खेती की जाती हैं। वहीं, अफीम नीति घोषित होने में देरी के कारण किसानों का आक्रोश बढ़ता जा रहा है। इस संबंध में किसानों का कहना है कि अफीम नीति में देरी करना कहीं साजिश का हिस्सा तो नहीं है, क्योंकि देरी से पट्टा मिलने पर किसान औसत नहीं दे पाएगा और उसका लाइसेंस निरस्त हो जाएगा। इधर, किसानों ने अफीम नीति को जल्द घोषित करने की मांग उठाई है। किसानों ने सीपीएस जैसी खेती को बंद करने के साथ-साथ डोडाचूरा को भी एनडीपीएस एक्ट से बाहर निकालने की बात की है। उनका कहना है कि डोडाचूरा में महज 0.2 प्रतिशत ही मॉर्फिन की मात्रा होती है, जबकि वैद्य नशे की गोलियों में 5 से 10 एमजी तक का नशा रहता है। किसानों ने कहा कि वह कड़ी धूप और मौसम की मार को झेलकर डोडाचूरा वेस्ट मटेरियल के रूप में बेचता है, तो उस पर एनडीपीएस का मुकदमा बना दिया जाता है। इसलिए किसानों का कहना है कि या तो सरकार इसे खरीदना शुरु करे या एनडीपीएस एक्ट से डोडाचूरा को बाहर किया जाए।

अफीम का बीमा करने की उठी मांग

सिंघवी ने कहा कि महंगी अफीम की फसल का भी बीमा किया जाना चाहिए ताकि किसानों को क्षतिपूर्ति मिल सके। उन्होंने प्राकृतिक आपदा, काली मस्सी, कोहरा, पाला गिरने, ओलावृष्टि, धोली मस्सी, बेमौसम बरसात जैसी आपदा पर नुकसान होने पर किसानों को प्रत्येक 10 आरी पर 25 हजार रुपए के मुआवजे का प्रावधान किया जाना चाहिए।

20 आरी का पट्टा जारी करने, मूल्य बढ़ाने की मांग

विधायक सिंघवी ने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को जारी पत्र में अफीम नीति वर्ष 2024-25 के तहत कई सुधारों की मांग की है। पिछले वर्षों की तरह दो प्लॉट में बुवाई का आदेश दिया जाए, न कि एक प्लॉट का। किसानों का बुवाई का रकबा 10 आरी से बढ़ाकर 20 आरी किया जाए। सभी किसानों को समान आरी के पट्टे जारी किए जाएं। जीवित किसानों को अपनी स्वेच्छा और पारिवारिक सहमति से अफीम लाइसेंस किसी भी व्यक्ति को हस्तांतरित करने का अधिकार दिया जाए। 4 मार्फिन 3.2 प्रतिशत से अधिक औसत मार्फिन देने वाले किसानों को बुवाई के पट्टे जारी किए जाएं। अफीम का मूल्य कई वर्षों से नहीं बढ़ा है। इसे बढ़ाकर न्यूनतम 10 हजार रुपए प्रति किलो किया जाए। सीपीएस वाले डोडा चूरा का मूल्य 2 हजार रुपए प्रति किलो किया जाए। 1990 से अफीम की खेती कर रहे सभी किसानों को एक बार फिर से लाइसेंस जारी किया जाए। अफीम का परीक्षण केवल तोल केंद्र पर ही हो और वही अंतिम परिणाम माना जाए। एनडीपीएस एक्ट की धारा 8 और 29 को खत्म किया जाए क्योंकि ये किसानों के शोषण का आधार बनती हैं। अफीम से प्राप्त डोडा चुरा को एनडीपीएस एक्ट से हटाकर स्टेट आबकारी अधिनियम के तहत रखा जाए।