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रोकथाम के लिए कीटनाशक दवा का 15 दिन के अंतराल पर करें छिडक़ाव
बारां. जिले में गत दिनों हुई भारी बारिश के कारण खेतों में जलभराव की स्थिति बनी हुई है। अब बारिश थमने के साथ ही तापमान में निरंतर वृद्धि होने तथा मौसम अनुकूल होने के कारण खरीफ फसलों में कीटों और रोगों का व्यापक प्रकोप देखने को मिल रहा है।
संयुक्त निदेशक कृषि विस्तार धनराज मीणा ने बताया कि धान की फसल में तना छेदक इल्ली का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। इसकी पहचान शुरुआती अवस्था में भूरे रंग की लार्वा से की जा सकती है, जो बाद में काले-हरे रंग में बदल जाती है। इसके सिर पर उल्टे ल आकार के धब्बे पाए जाते हैं। यह इल्ली समूह में आक्रमण करती है और फसल को भारी नुकसान पहुंचाती है। नियंत्रण के लिए किसान जैविक कीटनाशी ऐजाडीरेक्टीन ईसी (10000 पीपीएम) 1000 मि.ली. प्रति हैक्टर या फ्लूबैन्ठामाईट, ईमामेक्टिन बेन्जोएट अथवा फ्लोरेंट्रेनीलीमेल का छिडक़ाव कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि सोयाबीन की फसल में फली बनने की अवस्था प्रारंभ हो चुकी है। भारी बारिश व जलभराव के कारण इसमें राइजोक्टोनिया जड़ गलन रोग, फली झुलसा (पॉड ब्लाइट) एवं पत्ती धब्बा रोग का प्रकोप देखने को मिल रहा है। इसकी रोकथाम के लिए पीकोक्सीस्त्रोबीऩ प्रोपिकोनाजोल एससी का 15 दिन के अंतराल पर छिडक़ाव लाभकारी है। वहीं, तम्बाकू इल्ली व सेमीलूपर के प्रकोप की स्थिति में अनुशंसित कीटनाशी दवाइयों का प्रयोग करने की सलाह दी गई है।
मीणा ने बताया कि अधिक जलभराव के कारण खरीफ फसलों में पीलेपन की समस्या भी सामने आ रही है। इसके निवारण के लिए खड़ी फसल में फेरस सल्फेट (हरा कसीस) का 0.5 प्रतिशत घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर 25 किलो की दर से छिडक़ाव करना चाहिए।
Published on:
28 Aug 2025 05:13 pm
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