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Video …कभी हिडिम्बा का मंडप बना था,अब शिव विराजित हैं यहां, हांडीपाली पालेश्वर महादेव का मंदिर

कोटा जिले की पीपल्दा तहसील की सीमा है। बाणगंगा नदी के किनारे स्थित मंदिर का काफी धार्मिक महत्व माना जाता है। यहां शिवरात्रि को मेला भरता है।

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मांगरोल,बमोरी कलां.स्थापत्य कला का बेजोड़ प्रतीक हांडीपाली पालेश्वर महादेव का मंदिर देखरेख के अभाव में अपना वैभव खोता जा रहा है। मांगरोल उपखंड मुख्यालय से 13 किमी. दूर यह मंदिर मध्यप्रदेश की सीमा से सटा है। एक तरफ कोटा जिले की पीपल्दा तहसील की सीमा है। बाणगंगा नदी के किनारे स्थित इस मंदिर का काफी धार्मिक महत्व माना जाता है। यहां शिवरात्रि को मेला भरता है। जिसमें बड़़ी संख्या में दर्शनार्थी आते हैं।
36 कलात्मक खंभों पर खड़ा है यह मंदिर।इसके स्तंभ एकाएक गिनने में नहीं आते। शिल्पकला के बेजोड़ नमूने इस शिवालय में उत्कीर्ण चित्र स्थापत्य कला के जीवंत प्रमाण के रुप में मौजूद हैं। महिषासुर मर्दिनी,कार्तिकेय व मयूर की विभिन्न भाव भंगिमाओं का चित्रण कुशलता से कारीगरों द्वारा उकेरा गया है। तीन खंडों में निर्मित मंदिर के सभा मंडप में आदमकद मूर्तियां लगी हैं। मंदिर की मूर्तियां कोणार्क व खजुराहो से मेल खाती हैं। रामगढ़ के भंडदेवरा व इस मंदिर के शिल्प में फर्क इतना सा है कि वहां अध्यात्म को काम से जोड़ती कला को दर्शाया गया है। तो यहां धार्मिक पक्ष ज्यादा उजागर हुआ है।
भीम से जुड़ी है यादें- क्विदंती के अनुसार महाभारत काल में पांडवों ने यहां अज्ञातवास किया। उस समय भीम ने यहां एक राक्षस हिडम्ब से युद्व कर विजय प्राप्त की थी। इसी समय भीम की राक्षस की ***** हिडम्बा से शादी हुई। विवाहोत्सव पर मंडप के रुप में रातों रात यहां पालेश्वर का निर्माण हुआ। सवेरा हो जाने से शिखर का काम बंद कर देने से अधूरा रह गया। पूर्व में हिडम्बिका पांडेश्वर महादेव अब हांडीपाली के पालेश्वर महादेव के नाम से यह धार्मिक स्थल विख्यात है।
आभा खो रहा मंदिर - मंदिर के बाहर लगी साधुओं की धूणी प्रकाश व हवा के निकास के अभाव में भीतरी हिस्सा काला हो गया है। मानवीय आस्था के ईश्वर से एकाकार होने की ललक को दर्शाते
्र इसके गगनचुंबी शिखरों की सार संभाल न होने से इसके धूल धुसरित होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।
पटिटका लगाने के सिवा कुछ नहीं किया- वर्ष 1985 में पुरातत्व विभाग के अधीन इस मंदिर पर इन 32 सालों में विभाग ने बोर्ड लगाने के सिवा कुछ नहीं किया। शिवालय के खाते उस जमाने से 70 बीघा कृषिभूमि है। लेकिन देखरेख के अभाव में बहुमुल्य शिल्प की दुद्र्रशा हो रही है।
चुरा ले गए मूर्तियां- सूने स्थान पर होने के कारण सबसे ज्यादा फायदा मूर्ति चोरों ने उठाया। काफी कलात्मक मूर्तियों को चेार ले गए। यह सिलसिला अब भी जारी है। मंदिर के एक ओर विशाल चटटानों पर होकर बह रही बाणगंगा नदी यहां आकर नयनाभिराम हो जाती है। तो दूसरी ओर गौमुख से निकली धारा जहां श्रद्वालु स्नान कर पुण्य कमाते हैं। यह द्वश्य भी मनोहारी है।
साधन का अभाव अखरता है- नदी के उपर पुलिया बनने से मंदिर तक आने जाने की सुविधा हो गई। लेकिन पुलिया नीची होने से बरसात में रास्ता रुक जाता है। कोटा से चलकर बमोरीकलां तक आने वाली बस सेवा अरसे से बंद है। बस शुरु हो जाए तो ग्राम पंचायत बमोरीकलां को परिवहन सुविधा से जोडऩे की घोषणा भी पूरी हो जाए वहां मंदिर पर आने वाले श्रद्वालुओं के लिए भी साधन मुहैया हो जाए। बमोरीकलां से मंदिर की दूरी मात्र एक किमी ही है।