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खूंटा तो आपने सुना होगा जहां पशुओं को बांधा जाता है पर कभी खूंटा टैक्स के बारे में सुना है? हम बताते हैं आपको

दरअसल पशु मेले में पशुओं को बेचने आए व्यापारियों से ग्राम पंचायत टैक्स वसूलती है इसे ही खूंटा टैक्स कहा जाता है।

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दरअसल पशु मेले में पशुओं को बेचने आए व्यापारियों से ग्राम पंचायत टैक्स वसूलती है इसे ही खूंटा टैक्स कहा जाता है। हरनावदा शाहजी के पशु मेले में इस बार खूंटा टैक्स काफी कम मिला है। कस्बे में चल रहे पशु मेले में सोमवार को आयोजित चावड़ी समारोह के दौरान ग्रामपंचायत द्वारा खूंटा टैक्स के रुप में वसूला गया राजस्व गत वर्ष से भी कम रहा। इस बार जहां मेले में पशुओं की आवक कम रही तो वहीं खरीदार भी गत वर्ष की तुलना में काफी कम आए। जिससे कई पशु पालकों को तो वापस बिना बेचे ही वापस लौटना पड़ा। पशु मेले में इस बार पशुओं की आवक शुरु से ही कम रही। जबकि खरीदार व्यापारी भी कम आए। जिससे लोगों को मवेशियों के भाव नहीं मिले। ऐसे में ज्यादातर पशु पालक निराश लौट गए। सरपंच हेमंत दोलिया ने बताया कि गत वर्ष नोटबंदी के कारण मेला प्रभावित रहा था और चावड़ी से मिलने वाला राजस्व मात्र 65 हजार रुपए ही रहा था। जबकि उससे पहले वाले साल में यह आंकडा एक लाख 65 हजार रुपए का था। उन्होंने बताया कि नोटबंदी के दौरान गत वर्ष खरीदार बड़ी संख्या में आए थे जबकि लोगों को नोटों की जरुरत होने से औने पौने दामों में ही बेचे थे। जिससे राजस्व पचास फीसदी रह गया था, लेकिन इस साल तो आंकडा घटकर पचास हजार के करीब ही रह गया। बिकवाली वाली मवेशियों की संख्या ढाई सौ से तीन सौ के लगभग रही।

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पहले ही वसूल होगा खूंटा टैक्स
सरपंच ने बताया कि मेले में इस बार लोगों ने खूंटा टैक्स की भी काफी चोरी की। मवेशी बेचने के बाद भी नहीं बेचना बताकर टैक्स चोरी की। उन्होंने बताया कि टैक्स चोरी को रोकने के लिए आगामी साल में टैक्स वसूूली प्रवेश के साथ ही की जाएगी, ताकि चोरी पर अंकुश लग सके।
51 हजार में बिका पाडा
इधर मेले में इस बार एक पाडा इक्यावन हजार रुपए में बिका। पशु मेले में पशुओं की आवक कम रहने के बावजूद रविवार को एक पाड़ा 42 हजार रुपए में बिका था। इसे बेचने झालावाड़ जिले के अकलेरा क्षेत्र से पशु पालक आए थे। जबकि खरीदा स्थानीय व्यापारी मोहम्मद शब्बीर उर्फ छंग्या ने। दूसरे दिन ही उसके दाम 51 हजार रुपए लगने पर उसी पाड़े को दुबारा बेच दिया। पाड़ा की खरीद फरोख्त के दौरान काफी भीड़ रही। बताया जाता है कि इससे पहले यहां पाड़े बिके, लेकिन उनका भाव चालीस हजार के नीचे ही रहा।