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जमीं पर आबाद, कागज में उजाड़

नदीपार बसी भगवानपुरा व सती चबूतरा बस्तियां बरसों से आबाद हैं, लेकिन नगरपालिका के रिकार्ड में गैर आबादी में दर्ज होने के कारण सरकारी योजनाओं के लाभ से लोग वंचित हैं ।

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kagjo me aabad

सरकारी मनमानी का उदाहरण
सरकारी योजनाओं का नहीं मिल रहा लाभ
मांगरोल . नगरपालिका क्षेत्र की नदीपार बसी भगवानपुरा व सती चबूतरा बस्तियां बरसों से आबाद हैं, लेकिन नगरपालिका के रिकार्ड में गैर आबादी में दर्ज होने के कारण सरकारी योजनाओं के लाभ से लोग वंचित हैं । गौरतलब तो यह है कि नगरपालिका लगभग 50 सालों से आबाद इन बस्तियों में रोड़ बना रही है। अन्य सुविधाएं भी दे रही थीं जिन्हें अब बंद कर दिया है। कई लोगों को आवासीय भूमि के चालीस सालाना पटटे भी जारी कर रखे हैं। विकास के हर काम यहां करवाए जाते रहे हैं। यहां के बाश्ंिादे नगरपालिका के वार्ड नम्बर एक के रुप में मतदाता सूची में भी हैं। इसके बावजूद ध्यान न देने के कारण इन बस्तियों को अब भी गैर आबादी में माना जा रहा है।
योजना आई तो पता चला
पांच बरस पहले कच्ची बस्ती योजना में सर्वे में शामिल लोगों को जब सरकारी सहायता देने का नम्बर आया तब नगरपालिका को पता चला कि ये बस्तियां गैर आबादी में दर्ज हैं। ऐसे में इन बस्तियों में निवास करने वाले लोगों को सरकार द्वारा मकान बनाने के लिए आए 90 हजार रु. की सहायता भी नहीं मिल पाई। यहां प्रधानमंत्री योजना में भी इन बस्तियों के शामिल होने की संभावनाओं पर भी विराम लग गया हैं
अब तो पट्टे भी नहीं बना रहेे
नगरपालिका में यहां के रहवासियों ने अपने मकानों के पटटे बनाने के लिए लगभग सौ फ ाइलें लगा रखी हैं। लेकिन इस बात का पता चलने के बाद अब नगरपालिका ने पटटे बनाने पर भी रोक लगा दी है। ऐसे में ये फ ाइलें नगरपालिका में धूल चाट रही हैं। जिन लोगों के पास पूर्व में जारी पट्टे हैं वह भी ज्यों के त्यों ही हैं।
कैसे हुआ यह सब
जहां बस्ती आबाद है वह चरागाह की भूमि है। वहां पहले लोग खलिहान डालते थे। धीरे धीरे यहां लोग कच्चे पक्के मकान बनाकर रहने लगे और बस्तियां आबाद हो गईं। नगरपालिका न तो यहां बसे लोगों को बेदखल कर पाई और अब हालात यह है कि लोगों को सरकारी सुविधाओं से वंचित होना पड़ रहा है।
& इसे नगरपालिका की आबादी में बदलने का प्रस्ताव जिला कलक्टर को भेजे तीन साल होने को आए लेकिन अभी तक फाइल पर विचार ही नहीं किया जा रहा।
अमित चौपड़ा अध्यक्ष नगरपालिका मांगरोल
रिपोर्ट - हंसराज शर्मा द्वारा
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