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सोयाबीन ने उखाड़ी सांस, सरसों से टूटने लगी आस

जिले में डीएपी की कमी से किसानों में मचने लगी मारामारी, इस वर्ष भी रेकॉर्ड तोड़ सकती है जिले में चने की बुवाई

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सोयाबीन ने उखाड़ी सांस, सरसों से टूटने लगी आस

सोयाबीन ने उखाड़ी सांस, सरसों से टूटने लगी आस

बारां. मौसम ने इस वर्ष खरीफ की फसलों में तो खराबा किया ही, रबी की फसलों की बुवाई का गणित भी गड़बड़ा दिया। दिन बीतने के साथ ही सरसों की बुवाई का समय निकला जा रहा। ऐसे में किसान इस साल फिर चने की बुवाई के लिए विवश हो सकते हैं, लेकिन इनदिनों तो बाजार में डीएपी खाद की कमी से धरतीपुत्रों का दम फूला हुआ है। इस माह में अब तक जिले में महज 6500 मीट्रिक टन डीएपी की उपलब्धता बताई जा रही है, जबकि हालात उल्ट हैं। उर्वरक विक्रेताओं के यहां यह स्टाक रीत चुका है। इससे अब नई खेप की बेसब्री से प्रतीक्षा हो रही है। राज्य सरकार ने डीएपी के विकल्प के रूप में सिंगल सुपर फास्फेट (एसएसपी) का उपयोग बढ़ाने के निर्देश जारी किए है। कृषि अधिकारी किसानों को इसके लिए समझाइश में जुटे हैं।
3.36 लाख हैक्टेयर में होगी बुवाई
कृषि विभाग के सूत्रों के अनुसार इस वर्ष रबी की फसलों की बुवाई के लिए 3.36 लाख हैक्टेयर क्षेत्रफल निधा्ररित किया गया है। किसान सरसों की मांग के साथ बढ़े भाव को देखते हुए इसकी बुवाई के लिए उतावले हैं, लेकिन इसकी बुवाई का आदर्श समय 15 सितम्बर से 15 अक्टूबर तक है। वर्तमान में 90 फीसदी खेतों में सोयाबीन की कटाई नहीं हुई। ऐसे में सरसों की बुवाई का किसानों का ख्वाब टूटना लगभग तय है। यह किसान न चाहते हुए भी चने की बुवाई को विवश होंगे।
आवंटन हो गया, आपूर्ति का इंतजार
कृषि विभाग के सूत्रों की मानें तो जिले को इस वर्ष के लिए 18 हजार मीट्रिक टन डीएपी व 65 हजार मीट्रिक टन यूरिया का आवंटन हो गया है। अब इसकी आपूर्ति का इंतजार है और यही इंतजार किसानों की नींद उड़ा रहा है। जिले को वर्तमान अक्टूर से दिसम्बर माह तक लगातार 20-20 हजार मीट्रिक टन यूरिया मिलना है। जबकि यहां अभी 12000 मीट्रिक टन डीएपी की आपूर्ति होनी है। इससे किसानों का धैर्य जवाब देने लगा है तथा वे खरीफ के खराबे से उभरने के लिए रबी की फसलों की बुवाई के लिए सभी प्रयास करने में नहीं हिचक रहे।
-मानसून के देर तक सक्रिय रहने से सरसों की बुवाई प्रभावित हुई है। इसका क्षेत्रफल घटने से चने का क्षेत्रफल बढ़ेगा। जिले के किसानों को एसएसपी के उपयोग के लिए प्रेरित किया जा रहा है। यह डीएपी का बेहतर विकल्प है। हालांकि आवश्यकता अनुसार आवंटन होने से डीण्पी व यूरिया की कमी नहीं आएगी।
-अतीश कुमार शर्मा, उपनिदेशक विस्तार