
- भुवनेश पंड्या
बारां। उल्कापिंड टकराने के नाम से ख्यात हुआ राजस्थान के बारां जिले के रामगढ़ जल्द ही दुनिया के उन गिने-चुने क्षेत्रों में शामिल होने वाला है जहां यूरेनियम का उत्खनन होगा। हालांकि विश्व जियोलॉजिकल समुदाय की इसपर आखिरी मुहर लगनी बाकी है। मालूम हो कि जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने गत दिनों रामगढ़ को जियो हैरिटेज साइट घोषित किया था। इलाहाबाद विवि के नेशनल सेंटर ऑफ एक्सपेरिमेंटल मिनरोलॉजी एवं पेट्रोलियम के निदेशक प्रो. जयंत कुमार ने जयन्त कुमार पति ने पत्रिका से विशेष बातचीत में बताया कि जो उल्कापिंड रामगढ़ से टकराया था, वह उसे यूरेनियम का खजाना देकर गया है। उन्होंने बताया कि रामगढ़ में कई वैज्ञानिकों ने सर्वे किया है। रामगढ़ स्ट्रक्चर (धरती का उठा हुआ हिस्सा) की खोज में हर बात स्पष्ट हो चुकी है, लेकिन इसपर अंतिम मुहर इसलिए नहीं लगी है क्योंकि सॉफ्ट फीचर नहीं मिलने से प्रमाणित नहीं हुआ है।
मोहनलाल सुखाडिय़ा विवि के भू-विज्ञान विभाग की ओर से आयोजित कार्यशाला में आए प्रो. जयन्त कुमार ने बताया कि एक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक दल रामगढ़ में जरूरी जांच पूरी कर गया है। उम्मीद है कि जल्द ही हमें खुशखबरी मिलेगी। महाराष्ट्र का लोनार, मध्यप्रदेश के शिवपुरी का ढाला स्ट्रक्चर और अब राजस्थान के रामगढ़ में उल्कापिंड गिरने की वजह से दुनिया में नाम हुआ है। 3800 मिलियन वर्ष पूर्व यहां उल्कापिंड टकराया था। वर्ष 1858 से पहले से ही इस पर खोज जारी है।
रामगढ़ जैसी स्थिति कहीं नहीं
रामगढ़ जैसी स्थिति कहीं नहीं है जो चारों ओर पहाड़ों से घिरा हुआ है। बीच में कुछ उठा हुआ हिस्सा है। पत्थर ऐसे खड़े हैं, जिसे देखकर आसानी से कहा जा सकता है कि इस पर कोई तेज टकराहट हुई है। शिवपुरी में पिघला हुआ ग्रेनाइट है। यह जमीन में छह किलोमीटर तक बह चुका है, जिसे उल्कापिंड की टक्कर वाला विश्व का सबसे पुराना क्षेत्र बताया जातसा है। जल्द ही इस पर मुहर लगेगी। प्रो. जयंत ने साइंस जनरल का हवाला देते हुए कहा कि लोनार में उल्का पिंड टकराने से गैस निकली जिसके चलते पुरातनकाल में डायनोसोर की प्रजाति समाप्त हो गई।
जानिए क्या होता है उल्कापिंड
अंतरिक्ष से कभी-कभी आकाशीय पिंड पृथ्वी पर गिरते हुए दिखाई देते हैं उन्हें उल्का और साधारण बोलचाल में टूटता तारा कहा जाता है। ये वायुमंडल में प्रवेश करते समय जल उठते हैं लेकिन कुछ बचकर पृथ्वी तक पहुंच जाते हैं जिन्हें उल्कापिंड कहा जाता है। हर रात अनगिनत उल्काएं देखने को मिलती हैं लकिन पृथ्वी तक पहुंचने वाले पिंडों की संख्या बहुत कम होती है।
Published on:
16 Mar 2019 09:52 am
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