
फोटो: पत्रिका
करीब सवा सौ साल पहले जिन जंगलों में चीते कुलांचे भरते थे, आज अफ्रीका से आए उनके वंशज उसी धरती की ओर खिंचे चले आ रहे है। मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क से भागकर चीता केपी-3 पिछले एक महीने से बारां और कोटा के जंगलों में डेरा डाले हुए है, जबकि केपी-2 को तो जैसे हाड़ौती का रास्ता ही याद हो गया है। उसे जितनी बार पकड़कर कूनो छोड़ा जाता है, वह हर बार भागकर वापस राजस्थान आ जाता हैं। उसे कई बार यहां से पकड़कर कूनो नेशनल पार्क छोड़ा गया, लेकिन हर बार वह भागकर यहीं आ पहुंचता है। फिलहाल यह चीता बारां-कोटा होते हुए रणथम्भौर टाइगर रिजर्व क्षेत्र में विचरण कर रहा है।
वन्यजीव विशेषज्ञ इसे संयोग नहीं बल्कि प्रकृति का संकेत मान रहे हैं। उनका कहना है कि चीतों को जहां अनुकूल वातावरण मिलता है, वे वहीं टिकते हैं और हाड़ौती उनके लिए बिल्कुल मुफीद है। इतिहास भी इसकी पुष्टि करता है। इम्पीरियल गजट ऑफ इंडिया के अनुसार सन् 1900 के आसपास हाड़ौती के जंगलों में चीतों की मौजूदगी देखी गई थी।
विशेषज्ञों के अनुसार चीते के लिए 72 वर्ग किलोमीटर का एरिया चाहिए होता है। यह केवल कूनो में संभव नहीं है। इसलिए अब कूनो के साथ बारां के जंगलों को भी चीता कॉरिडोर के रूप में शामिल करना चाहिए। बारां मांगरोल के पास बांझ आमली और रावतभाटा के पास एकलिंगपुरा के जंगल चीतों के सबसे अनुकूल हैै। बारां के शेरगढ़ अभयारण्य को भी विकसित किया जा सकता है। यह जंगल मैदानी है। यहां घास भी खूब है।
जानकारों के अनुसार आजादी से पहले राजा और मुगल शासक शिकार [कोर्सिंग] के शौक के लिए नर और मादा चीते पालते थे। वे इन चीतों को बाड़े में भूखे और आंखों पर पट्टी पर बांधकर रखते थे। फिर जंगल में काला हिरण और चीतल के शिकार के उन्हें चीते को बाड़े से छोड़ते थे। बाड़े में रहने के कारण इनकी प्रजनन क्षमता कमजोर हो गई और वे धीरे-धीरे विलुप्त होते गए। इसके अलावा चीता घास के मैदान और झाडिय़ों वाले मैदान में रहना पसंद करता है। जैसे-जैसे आबादी बढ़ती गई। घास के मैदान खेतों और गांवों में तब्दील होते गए। जंगल के अभाव में ये खत्म हो गए। पिछले पांच दशक में नई तकनीकों से चीतों की प्रजनन क्षमता काफी बढ़ी है।
वर्ष 1947 में छत्तीसगढ़ में सरगुजा के राजा के साथ चीतों के आखिरी शिकार की फोटो देखी गई। केन्द्र सरकार ने 1952 में देश से चीतों को विलुप्त घोषित कर दिया था। इसके बाद मध्य प्रदेश सरकार ने सितम्बर 2022 में कूनो नेशनल पार्क में नामीबिया से 8 चीते लाकर उनका पुनर्वास किया। बाद में फरवरी 2023 में 12 चीते लाए गए। अब कूनो में इनकी संख्या 55 से ज्यादा हो गई है। जबकि गांधी सागर अभ्यारण्य के क्लोजर में दो चीते रखे गए है।
कूनो का चीता केपी-3 शेरगढ़ वन्यजीव अभ्यारण्य और आसपास विचरण कर रहा है। उसे वन्यजीव संरक्षण और प्रबंधन की दृष्टि से शेरगढ़ अभयारण्य में ही स्थायी रूप से बसाने और स्थानान्तरित करने के लिए समुचित कार्रवाई होनी चाहिए। इस बारे में राज्य के वनमंत्री को पत्र लिखा है।
प्रताप सिंह सिंघवी, विधायक छबड़ा
चीतों को बार-बार पकडक़र स्थानान्तरित करना उनके प्राकृतिक व्यवहार के विपरीत है। हाड़ौती के घास के मैदान चीतों के लिए नए उपयुक्त स्थान है। उन्हें स्वतंत्र विचरण करने और बसने देने से ही देश में उनका संरक्षण हो पाएगा। चीतों को राजस्थान में बसाने के लिए वर्ष 2011 से प्रयास कर रहे हैं।
डॉ. सुधीर गुप्ता, संयोजक
हमलोग संस्था कोटा हमारी कूनो के अधिकारियों के साथ बात हुई है। जब तक केपी-3 शेरगढ़ और बारां जिले के जंगलों में विचरण करता रहेगा। उसे ट्रेंकुलाइज कर वापिस कूनो नहीं ले जाया जाएगा। केपी-3 यहां बढिय़ा से रह रहा है। उसे भरपूर प्रे बेस मिल रहा है। हमारे पास बड़ी संख्या में चिंकारा, काले हिरण और जीव है, जो चीते को पसंद है।
अनुराग भटनागर, उपवन संरक्षक [वन्यजीव] कोटा
Published on:
25 Apr 2026 01:25 pm
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