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Independence Day Special : बरेली के इस चर्च में क्रांतिकारियों ने 40 अंग्रेजों को कर दिया था खाक

सैकड़ों वर्ष पुराना ये चर्च 1857 की क्रान्ति का मूक दर्शक है। तत्कालीन पादरी के परिवार समेत इसमें 40 अंग्रेज जलकर खाक हो गए थे।

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suchita mishra

Aug 09, 2017

बरेली। 1857 की क्रांति अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आजादी की लड़ाई की पहली बड़ी क्रान्ति थी। इस क्रान्ति ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। 1857 की क्रान्ति की आग रुहेलखण्ड में भी फैली और यहां की सरजमीं के रुहेला सरदारों ने अंग्रेजों से मोर्चा लिया। बरेली क्लब के सामने स्थित 177 साल पुराना फ्री विल बैप्टिस्ट चर्च स्वतन्त्रता संग्राम की कहानी समेटे हुए है और आज यह ईसाई समाज की आस्था का प्रमुख केंद्र है। 1857 की गदर में क्रांतिकारियों ने इस चर्च पर हमला कर चर्च में आग लगा दी थी जिसमें तत्कालीन पादरी के परिवार समेत 40 अंग्रेज जलकर खाक हो गए थे।

दरअसल ईस्ट इंडिया कंपनी के लोग जब ब्रिटिश सरकार का अंग बने, तब उन्होंने ईसाई समुदाय से धन एकत्र कर सन 1838 में चर्च का निर्माण कराया। ब्रिटिश बिशप डैनियल विल्सन डी डी कोलकाता से यहां आए और चर्च का निर्माण किया। जिसके बाद ये चर्च अंग्रेजों का प्रमुख ठिकाना बन चुका था।

1857 का संग्राम जब शुरू हुआ तो क्रांतिकारियों की नजर इस चर्च पर पड़ी और 31 मई 1957 को चर्च पर हमला कर दिया और चर्च के पादरी डेनियल विल्सन के पूरे परिवार समेत 40 अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया। जंग का प्रारंभ फतेहगंज पश्चिमी से हुआ था। पादरी और उनके परिवार की कब्रें आज भी चर्च परिसर में बनी हैं।

इस हमले ने ब्रिटिश सरकार को हिलाकर रख दिया क्योंकि ऐसा पहली बार था जब क्रान्तिकारियों ने एक साथ इतनी तादाद में अंग्रेजों को मौत के घाट उतारा था। इसके बाद अंग्रेजों को चर्च के अंदर बन्दूक साथ ले जाने की इजाजत दी गयी और चर्च की बैंच को दोबारा स्थापित किया गया, जिसमें बन्दूक टांगने का स्थान भी बनाया गया। ब्रिटिशकालीन तमाम चर्चों में अब भी ऐसी संशोधित बैंच मौजूद हैं।

हमले के बाद चर्च की मरम्मत कराई गयी और आज ये चर्च स्वतन्त्रता संग्राम की यादें लिए कैंट क्षेत्र में स्थित है। यहां पर काफी तादाद में ईसाई प्रार्थना के लिए आते हैं। क्रिसमस के अवसर पर चर्च में विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है जिसमें काफी तादाद में लोग शामिल होते हैं और दुआ करते है।

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