
पंडित राधेश्याम कथावाचक
बरेली। रामायण के आदर्श और संवादों में डूबे पंडित राधेश्याम कथावाचक का योगदान भारतीय संस्कृति में अमिट है। 25 नवंबर 1890 को बरेली के बिहारीपुर मोहल्ले में जन्मे पंडित राधेश्याम ने अपनी अनूठी काव्यशैली और रामायण के सरल संवादों के जरिए जनमानस पर गहरी छाप छोड़ी। मात्र 17-18 वर्ष की आयु में उनकी रचना 'राधेश्याम रामायण' ने उन्हें अमर कर दिया। उनके जीवनकाल में ही इस महाकाव्य की सवा करोड़ प्रतियां बिक गई थीं।
पंडित राधेश्याम का लेखन बहुआयामी था। उन्होंने अपने जीवनकाल में कुल 57 पुस्तकें लिखीं और 150 से अधिक ग्रंथों का संपादन किया। 26 अगस्त 1963 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी रचनाओं की गूंज आज भी रामलीला के मंचों पर सुनाई देती है। बरेली के सुभाषनगर और विंडरमेयर थिएटर की रामलीलाओं में उनकी कृति 'राधेश्याम रामायण' के संवाद कलाकारों और दर्शकों को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं।
पंडित राधेश्याम की ख्याति न केवल भारत में, बल्कि विदेशों में भी फैल गई। उनकी गायन शैली और मधुर कथा वाचन से लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे। उनकी पौत्री शारदा भार्गव ने एक घटना का जिक्र किया जब वे अहिल्या उद्धार स्थल से लौटते समय स्टेशन पर रुके। यात्रियों और रेल कर्मियों ने उनसे कथा सुनाने का आग्रह किया। जैसे ही उन्होंने कथा शुरू की, ट्रेन को 45 मिनट तक रोक दिया गया, और यात्री कथा सुनने के लिए ट्रेन से नीचे उतर आए।
देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भी राष्ट्रपति भवन में उन्हें बुलवाकर 15 दिनों तक रामकथा का आनंद लिया। उनकी मधुर आवाज आज भी राष्ट्रपति भवन के संग्रहालय में संरक्षित है।
शारदा ने बताया कि एक बार मोतीलाल नेहरू की पत्नी गंभीर रूप से बीमार हो गई थीं। डॉक्टरों ने इलाज के प्रयास छोड़ दिए थे। इस स्थिति में पंडित राधेश्याम को इलाहाबाद बुलाया गया, जहां उन्होंने सवा महीने तक रामकथा सुनाई। इसके बाद नेहरू की पत्नी स्वस्थ हो गईं।
रामलीला में श्रीराम का किरदार निभाने वाले दानिश ने कहा, "राधेश्याम रामायण के संवाद इतने सरल और मधुर हैं कि वे सीधे दर्शकों के दिल में उतर जाते हैं।" वहीं, सीता का किरदार निभाने वाली वृंदा बाजपेयी ने कहा, "मंच पर जब हम राधेश्याम रामायण के संवाद बोलते हैं, तो दर्शक हर दृश्य को गहराई से महसूस करते हैं। यह रामायण हमें हमारी संस्कृति और जड़ों से जोड़ती है।"
राधेश्याम कथावाचक का योगदान न केवल साहित्यिक बल्कि सांस्कृतिक धरोहर के रूप में हमेशा याद किया जाएगा। उनकी कालजयी कृति 'राधेश्याम रामायण' आज भी रामलीला मंचों पर जीवंत है और नवोदित कलाकारों को प्रेरित करती है।
Published on:
25 Nov 2024 10:38 am
बड़ी खबरें
View Allबरेली
उत्तर प्रदेश
ट्रेंडिंग
