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जिस वीर से खौफ खाते थे अंग्रेज, आजाद देश में उसकी कोई कदर नहीं

अफसर अब आजादी के इस दीवाने खान बहादुर खान को मानो भुला चुके है। यही कारण है कि खान बहादुर खान की मजार बदहाल स्थिति में है।

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जिस वीर से खौफ खाते थे अंग्रेज, आजाद देश में उसकी कोई कदर नहीं

बरेली। शहीदों की चिताओं पर हर वर्ष जुड़ेंगे मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशाँ होगा। लेकिन सरकारी अफसरों की उदासीनता के चलते आजादी के दीवानों की निशानियां या गुम हो गई हैं या फिर बदहाल है। एक ऐसी ही आजादी की लड़ाई की निशानी खान बहादुर खान की मजार सरकार की उदासीनता के चलते बदहाल हो चुकी है। आजादी की लड़ाई में रुहेला सरदार खान बहादुर खान ने अंग्रेजों दांत खट्टे कर दिए थे। खान बहादुर खान से अंग्रेज कुछ कदर खौफ खाते थे कि उनको फांसी देने के बाद बेड़ियों में जकड़ कर जिला जेल के भीतर ही दफन कर दिया था। आज भी खान बहादुर खान की मजार पुरानी जिला जेल के परिसर में है। लेकिन अफसर अब आजादी के इस दीवाने खान बहादुर खान को मानो भुला चुके है। यही कारण है कि खान बहादुर खान की मजार बदहाल स्थिति में है।

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बदहाली का शिकार मजार

पुरानी जिला जेल परिसर में खान बहादुर खान की मजार है। जेल में बंद खान बहादुर खान की कब्र को काफी लम्बी जद्दोजेहाद के बाद जेल से बाहर निकला जा सका। अब जिला जेल यहाँ से शिफ्ट हो जाने के कारण शहीद की मजार की देखभाल करने वाला कोई नहीं बचा हैं। शहीद की यह मज़ार सिर्फ एक यादगार है पर उन्हें याद करने यहाँ कोई नहीं आता हद तो यह है कि इसके रखरखाव के लिए भी यहाँ कोई नहीं है।बस इनके शहीद दिवस पर लोग यहाँ सिर्फ खानापूर्ती करने आते हैं।इस मज़ार के अलावा इस वीर क्रांतिकारी की कोई निशानी इस शहर में नहीं जो लोगो को उसकी याद दिलाये। मौजूदा समय में मजार तक आने वाली सड़क टूटी फूटी है साथ ही मजार के आस पास तमाम घास उग आई है। मजार का शीशा टूट गया है तो वहां पर ईंट लगा दी गई है। मजार की दीवारों पर काई जम चुकी है।

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आखिरी रुहेला सरदार थे खान बहादुर खान

खान बहादुर खान आखरी रोहिला सरदार थे वह अंग्रेजी कोर्ट में बतौर जज कार्यरत थे उन्हें अंग्रेज़ों का विश्वास हासिल था और इसी विश्वास का फायदा उठाकर उन्होंने अपनी पैदल सेना तैयार कर ली थी खान बहादुर ने अपने कई सैनिकों को दूसरे राज्यों में अंग्रेज़ों से लड़ाई के लिए भेजा,31 मई 1857 को नाना साहब पेशवा की योजना के अनुसार उन्होंने रुहेलखंड मंडल को अंग्रेज़ों से मुक्त करा लिया सभी अंग्रेज़ उनके डर से नैनीताल भाग गए इसके बाद लगातार खान बहादुर खान का अंग्रेज़ों से संघर्ष चलता रहा इस बीच लखनऊ के अंग्रेज़ों के अधीन चले जाने से नाना साहब भी बरेली आ गए इसके बाद नकटिया पुल पर 6 मई 1858 में आखरी बार अंग्रेज़ों और खान बहादुर खान के बीच संघर्ष हुआ जिसमे भारतीयों को हार का मुँह देखना पड़ा।इसके बाद खान बहादुर खान नेपाल चले गए लेकिन राणा जंग बहादुर ने धोखे से उन्हें अंग्रेज़ों के हवाले कर दिया खान बहादुर खान पर मुक़दमा चलाया गया और उन्हें यातनाएं दी गयी। 22 फरवरी को कमिश्नर रॉबर्ट ने दोषी मानते हुए खानबहादुर खान को फांसी की सजा सुना दी और 24 मार्च 1860 को उन्हें पुरानी कोतवाली पर सरे आम फांसी दे दी गयी।

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