उत्तराखण्ड के तराई इलाके में बसे रूहेलखण्ड में फूलों की खेती खूब फल फूल रही थी। आबोहवा भी फूलों की खेती के लिए काफी मुफीद थी। लेकिन ज़मीन पर कंकरीट के जंगल खड़े करने की होड़ में कॉलोनाइज़र्स की नज़र टेढ़ी हो गई। बहते हुए पानी का रूख़ मोड़ दिया गया तो हरा भरा जंगल काटकर ऊँची-ऊँची इमारतें खड़ी कर दी गईं। नतीजा यह हुआ कि कमल, कुमुदिनी, ख़स, अजोला, खैर का पेड़, महुआ, अश्वगंधा, चिरौंजी समेत करीब सात सौ पौधों की प्रजातियाँ समाप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं।