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कुलपति की कुर्सी पर महाभारत, प्रोफेसर केपी सिंह की हैट्रिक या नया चेहरा

महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विश्वविद्यालय में कुलपति पद को लेकर सियासी और अकादमिक हलचल तेज हो गई है। प्रोफेसर केपी सिंह का कार्यकाल अगस्त 2026 में पूरा होने जा रहा है, ऐसे में अब राजभवन की ओर सबकी नजरें टिकी हैं।

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बरेली। महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विश्वविद्यालय में कुलपति पद को लेकर सियासी और अकादमिक हलचल तेज हो गई है। प्रोफेसर केपी सिंह का कार्यकाल अगस्त 2026 में पूरा होने जा रहा है, ऐसे में अब राजभवन की ओर सबकी नजरें टिकी हैं। विश्वविद्यालय के गलियारों से लेकर लखनऊ तक दावेदारों की दौड़ शुरू हो चुकी है। विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसरों से लेकर बाहरी दिग्गजों तक, हर कोई कुलपति बनने की जुगत में लगा है। चर्चा है कि कई प्रभावशाली शिक्षकों ने तो लखनऊ में सक्रिय लॉबिंग भी शुरू कर दी है। आवेदन की अंतिम तारीख 13 अप्रैल को देखते हुए दावेदारों की गतिविधियां और तेज हो गई हैं।

प्रो. केपी सिंह ने 17 अगस्त 2020 को कुलपति पद संभाला था और अपने कार्यकाल में विश्वविद्यालय को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

  • उत्तर प्रदेश में सबसे पहले राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) लागू की
  • अटल एआई सेंटर और आरआईएफ की स्थापना कराई
  • विश्वविद्यालय को NAAC A++ ग्रेड दिलाया
  • 14 नए कॉलेज जोड़े और दर्जनों अंतरराष्ट्रीय एमओयू किए

उनके नेतृत्व में विश्वविद्यालय की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत हुई।

भूगोल बदला, आय पर संकट के संकेत

प्रो. केपी सिंह के कार्यकाल में विश्वविद्यालय का ढांचा भी बदला। मुरादाबाद और शाहजहांपुर में नए विश्वविद्यालय बनने के बाद रुहेलखंड विश्वविद्यालय का दायरा 598 कॉलेजों से घटकर 182 कॉलेजों तक सिमट गया।

सत्र 2026-27 से शाहजहांपुर के कॉलेज पूरी तरह अलग हो जाएंगे, जिससे विश्वविद्यालय की आय पर असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।

हैट्रिक’ पर सस्पेंस, राजभवन करेगा फैसला

प्रो. केपी सिंह को राज्यपाल आनंदीबेन पटेल पहले नियुक्ति और फिर सेवा विस्तार देकर भरोसा जता चुकी हैं। ऐसे में अब सवाल यह है कि क्या उन्हें तीसरी बार मौका यानी हैट्रिक मिलेगी या किसी नए चेहरे को कुलपति की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी।

इस पूरे मामले का फैसला अब 13 अप्रैल तक आने वाले आवेदनों और राजभवन के निर्णय पर टिका हुआ है।

कुलपति की कुर्सी को लेकर बढ़ती सरगर्मी ने शिक्षा जगत में नई बहस छेड़ दी है। विश्वविद्यालय के अंदर और बाहर दोनों जगह यह चर्चा जोरों पर है कि आने वाला कुलपति विश्वविद्यालय की दिशा और दशा तय करेगा।