
international nurses day: इन नर्सों ने कोरोना के 6 मरीजों को ठीक करने में निभाई अहम भूमिका, 28 दिन रहीं परिवार से दूर
बरेली। दुनिया में जहां डॉक्टरों को धरती पर भगवान के रूप में देखा जाता है वही अस्पतालों में नर्स की भूमिका इनसे कहीं जुदा नहीं है वर्तमान में कोरोना आपदा ने इस बात को और भी पुख्ता रूप से पेश किया है । जिस तरह घर में मरीज की सेवा के लिए मां-बाप, भाई-बहन मौजूद रहते हैं, उसी तरह अस्पताल में एक नर्स की भूमिका इससे इतर नहीं है। वह एक मरीज के साथ कभी मां की भूमिका में होती है तो कभी बहन की। इसी के साथ वह एक दोस्त बनकर कर भी वह मरीजों की सेवा में लगी रहती है। ऐसे ही एक मिसाल जिला अस्पताल में पहले छह कोरोना मरीजों की सेवा में लगी दो नर्सिंग ऑफिसर प्रोमिला और सोनिया ने अपने घर परिवार और जान की परवाह किये बगैर मरीजों को अपना बना लिया। पूरी टीम ने पहले 1 से 15 तक मरीजों की सेवा की उसके बाद 28 तारीख तक होम कांरनटाइन रहकर अपने परिवार से दूर रहे ताकि कोरोना का खतरा होने पर जनमानस में न फैले बीमारी ।
20 सालों से कर रही हैं मरीजों की सेवा
खून और एक्सीडेंट जैसी दुर्घटना से डर जाने वाली प्रोमिला 20 सालों से तन मन धन से मरीजों की सेवा कर रही हैं। प्रोमिला ने बताया कि सन 90 में आगरा से नर्सिंग ट्रेनिंग पूरी करने के बाद मरीजों का दर्द समझकर उनकी सेवा करने में इतनी मशरूफ हुई कि अभी तक उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। नेत्र विभाग में नियुक्त प्रोमिला ने बताया कि जब पता चला कि कोरोना मरीज की देखरेख के लिए हमारी टीम को चुना गया है तो बस आंख बंद करके जीजस से प्रे की और मरीजों के पास पहुंच गए। यह बीमारी पूरे विश्व के लिए नई थी किसी को नहीं पता था कि इसका इलाज कैसे किया जाना है इसलिए मरीजों का हाल सबसे ज्यादा बुरा था वह मानसिक रूप से परेशान थे जब मरीजों से बात करना शुरू किया तो दो-तीन दिन उन्होंने ढंग से बात नहीं की। वह परेशान रहते थे लेकिन फिर धीरे-धीरे जब उनके पास जाकर बैठते थे मुझसे बात करते थे तो जो पहले सिस्टर कहकर पुकारते थे वह दीदी कहने लगे। रोज शाम को वह खुद फोन करते और कहते कि हमारे लिए प्रेयर करिए। फिर क्या था रोज हमारी टीम जाकर उनके लिए प्रार्थना करती और जैसे यह हमारा रूटीन सा बन गया था। प्रोमिला ने बताया कि 1 से 15 अप्रैल तक हमें क्वॉरेंटाइन में रहना पड़ा करीब 28 दिन हम अपने परिवार से नहीं मिल पाए लेकिन यह सुकून था कि हमारे रहते हुए वह 6 मरीज एकदम स्वस्थ होकर अपने घर पहुंच गए।
पति ने अपने हाथों से बना खाना पहुंचाया
अमृतसर में रहने वाली और लुधियाना कॉलेज से जनरल नर्सिंग का कोर्स सन 99 में कोर्स खत्म करके सोनिया ने मरीजों की सेवा करना ही अपना धर्म बना लिया 2012 में सेकंड डिलीवरी के समय बरेली के जिला अस्पताल में ट्रांसफर हुआ। सोनिया ने बताया कि जिंदगी में इतनी भागदौड़ के बाद भी परिवार वालों क् सहयोग से सिर्फ मरीजों पर ही ध्यान दिया। सोनिया ने बताया जिस दिन पता चला कि कोरोना पॉजिटिव मरीजों के इलाज की टीम में शामिल हूं तो सच में डर गई और दो दिनों तक नींद नहीं आई। बेटा अक्षत जो कि 12वीं में है और बेटी अक्षिता पांचवी क्लास में पढ़ती है लेकिन दोनों बच्चों ने बहुत सपोर्ट किया और कहा यह मौका आपको नहीं छोड़ना चाहिए। इस समय मरीजों की मदद करना और मानसिक रूप से उन्हें मजबूत करना ही ज्यादा जरूरी है। शुरू शुरू में मरीज काफी डिस्टर्ब परेशान रहते थे जिसके कारण वह सही से बात नहीं करते थे और अलग थलग हो जाते थे लेकिन धीरे-धीरे टीम के प्यार और संयम से उनकी दूरियां खत्म होती चली गई। सबसे ज्यादा प्रेयर में बहुत ताकत होती है । जब 12 घंटे उनके साथ रहते थे तो दूसरा स्टाफ भी हमसे दूरी बनाकर रखता था तो कभी-कभी ऐसा लगता था कि इन मरीजों के साथ हमें भी कोरोना हो गया है। सोनिया ने बताया कि पहले 15 दिनों में ही उनको डायरिया हो गया जिसके कारण बाहर का खाना नहीं खा सकते थे तो रोज उनके पति अमित उनके लिए बिना घी तेल का खाना बना कर लाते थे। कभी-कभार घर वालों से वीडियो कॉल पर बात हो जाती थी और कभी इतना थक जाया करते थे कि रात में होटल में आकर सोने के अलावा कुछ नहीं समझ में आता था फिर अगले दिन मरीजों को मोटिवेट करने के लिए हमें मुस्कुराते हुए उनके साथ रहना होता था। उन्होंने बताया कि मरीजों से इतनी अच्छी बॉन्डिंग हो गई थी कि मदर्स डे पर सबसे पहले उन्ही मरीजों का फोन आया।
Published on:
12 May 2020 10:25 am
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