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Shraddh करते समय इन बातों का रखें ध्यान, पितृगण होंगे अति प्रसन्न

Pitru Paksh 2017 : शास्त्रों के अनुसार Shraddh के पांच प्रकार बताये गये हैं। नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि (नान्दी श्राद्ध) और पार्वण श्राद्ध।

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बरेली

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Mukesh Kumar

Sep 14, 2017

2018 Shradh Dates Shradh 2018 Dates Pitru Paksha Shraddha vidhi

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Baraily News - शास्त्रों में मनुष्य के तीन ऋण कहे गये हैं देव ऋण, ऋषि ऋण, पितृ ऋण। इसमें से पितृ ऋण को श्राद्ध करके उतारना आवश्यक है। ब्रह्म पुराण के अनुसार अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में यमराज यमपुरी से पित्रों को मुक्त कर देते हैं। वे अपनी संतानों तथा वंशजों से Pind Daan लेने के लिए पृथ्वी पर आते हैं। सभी व्यक्ति Shradh Paksh में अपने पितृगणों के नियमित श्राद्धकर्म का कार्य करते हैं। श्राद्ध से केवल पितृगण ही प्रसन्न नहीं होते बल्कि जो व्यक्ति श्राद्ध करता है वो चराचर रूप में विद्यमान सभी सूक्ष्म देवताओं को भी प्रसन्न करता है। श्रद्धापूर्वक किये गये श्राद्ध से ब्रह्मा इन्द्र, रूद्र, अश्विनी कुमार, सूर्य, अग्नि, वायु, पशुगण, समस्त भूतगण, सर्पगण, वायु देव एवं दिव्य रूप में स्थित ऋषिगण भी प्रसन्न होकर आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

श्राद्ध के पांच प्रकार (Type of Shraddh in Pitru Paksh)
बालाजी ज्योतिष संस्थान के ज्योतिषाचार्य पंडित राजीव शर्मा ने बताया कि शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध के पांच प्रकार बताये गये हैं। नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि (नान्दी श्राद्ध) और पार्वण श्राद्ध। प्रतिदिन पितृ देवताओं के लिए जो श्राद्ध किया जाता है उसे नित्य श्राद्ध कहते हैं। इसमें यदि जल से श्राद्ध कराया जाये तो भी पर्याप्त होता है। एकोदिष्ट श्राद्ध को नैमित्तिक श्राद्ध कहते हैं। किसी विशेष कामना की पूर्ति के लिए जब पितृ का श्राद्ध किया जाता है तो वो काम्य श्राद्ध कहलाता है। जब कुल में किसी प्रकार की वृद्धि का अवसर उपस्थित हो जैसे पुत्र जन्म, विवाह जैसे कार्य हों और श्राद्ध किया जाता है तो वो नान्दी श्राद्ध अथवा वृद्धि श्राद्ध कहा जाता है। इसके अतिरिक्त पितृ पक्ष अमावस्या या अन्य पर्व तिथियों पर जो श्राद्ध किया जाता है, उसे पार्वण श्राद्ध कहते हैं। दिन का आठवां मुहुर्त कुतप काल कहलाता है। इसका समय 11:36 बजे से 12:24 बजे तक लगभग होता हैं। यह श्राद्ध में विशेष प्रशस्त होता है। इसमें किया गया श्राद्ध अत्यन्त फलदायक होता है। दो वर्ष से पूर्व यदि किसी बालक की मृत्यु हो जाये, तो इसके लिए श्राद्ध या तर्पणादि करने की आवश्यकता नहीं है। यदि किसी व्यक्ति की अकाल मृत्यु हुई हो अथवा अपने पितृगणों के मोक्ष के लिए पितृ पक्ष सबसे उत्तम समय होता है।


ज्योतिषाचार्य पंडित राजीव शर्मा के अनुसार श्राद्ध पक्ष के सम्बन्ध में कुछ विशिष्ट बातों को श्रद्धापूर्वक ध्यान में रखकर श्राद्ध का कार्य सम्पन्न करने से पितृगण अति प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं।

श्राद्ध के दौरान ये करें (Shraddh ki Vidhi aur Mahatv)
- कम्बल, चांदी, कुशा, काले तिल, गौ और दोहित्र की श्राद्ध में विशेष महत्ता बताई गई है।
- श्राद्ध में पिण्ड दान करते समय तुलसी का प्रयोग अवश्य करना चाहिए। इससे पितृ प्रसन्न होते हैं।
- श्राद्ध में गाय के दूध से निर्मित वस्तुयें जैसे- दूध, दही, घी आदि काम में लेना श्रेष्ठ होता हो। सभी धान्यों में जौ, तिल, गेंहू, मूंग, सावा, कंगनी आदि को उत्तम बताया गया है।
- आम, बेल, अनार, बिजौरा, नीबू, पुराना आवंला, खीर, नायिल, खालसा, नारंगी, खजूर, अंगूर, परवल, चिरौंजी, बैर, इन्द्र जौ, बथुआ, मटर, कचनार, सरसो इत्यादि पितृों को विशेष प्रिय होती हैं। अतः भोजन आदि में इनका प्रयोग करना श्रेष्ठ रहता है।
- श्राद्ध के निमित्त ब्राह्मण भोजन करवाया जाता है। यदि ब्राह्मण नित्य गायत्री का जाप करता हो, सदाचारी हो तो उसे करवाये गये भोजन का विशेष फल प्राप्त होता है।
- श्राद्ध में भोजन करने वाले ब्राह्मण को यथा सम्भव मौन रखना चाहिए।
- श्राद्ध पक्ष में गाय का दान श्रेष्ठ माना गया है। यदि पितृों के निमित्त इस अवधि में गो दान किया जाये तो पितृगणों को विष्णु लोक की प्राप्ति होती है।
- श्राद्ध पक्ष के दौरान 'पितृसूक्त' का पाठ करने से पितृगण अत्यन्त प्रसन्न होते हैं। ब्राह्मण भोजन के समय पितृसूक्त का पाठ करने से इसका तुरन्त फल प्राप्त होता है।
- सम्पूर्ण श्राद्ध पक्ष में निम्नलिखित 'पितृ गायत्री' नित्य पाठ करना चाहिए।

इस मंत्र का करें जाप (Shraddh Mantra)
ऊँ देवताभ्यः पितृभ्यच्क्ष महायोगिभ्य एव च।
नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः।।


ज्येष्ठ पुत्र करे पिता का श्राद्ध
ज्योतिषाचार्य ने बताया कि पिता का श्राद्ध ज्येष्ठ पुत्र को ही करना चाहिए। स्मृति ग्रन्थों के अनुसार पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, दौहित्र, पत्नी, भाई, भतीजा, पिता, माता, पुत्र-वधु, बहन, भांजा तथा सपिण्डजनों को श्राद्ध करने का अधिकार है। यथा सम्भव पुरूष को ही श्राद्ध करना चाहिए। श्राद्ध से सम्बन्धित पूजा एवं कार्यों में चन्दन, खस और कपूर की गंध को उत्तम बताया गया है। श्राद्ध में सफेद चन्दन का प्रयोग करना चाहिए।

इनका प्रयोग वर्जित
- Pitru Paksh में तम्बाकू, तेल लगाना, उपवास करना, दवाई लेना, दूसरों का भोजना करना, दातून करना आदि वर्जित माना गया है।
- श्राद्ध के लिए आये ब्राह्मणों को भोजन पकाते व खिलाते समय लोहे के पात्र का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
- श्राद्ध पक्ष में मांस एवं मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए।
- गंधहीन पुष्पों, उग्र गंध वाले पुष्पों, काले या नीले रंग के पुष्पों अथवा किसी अशुद्ध स्थान पर उत्पन्न हुये पुष्पों का प्रयोग कदापि नहीं करना चाहिए।
- श्राद्ध में सब्जी या सलाद आदि बनाते समय बैंगन का प्रयोग अत्यन्त निषेध है। इसके अलावा उड़द, मसूर, अरहर, गाजर, लौकी, शलजम, हींग, प्याज, लहसुन, काला नमक, काला जीरा, सिंघाड़ा, जामुन, कुल्थी, महुआ, अल्सी एवं चना यह वस्तुयें भी श्राद्ध में वर्जित होती हैं।
- श्राद्ध में लाल चन्दन का प्रयोग कदापि नहीं करना चाहिए।

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