
प्रतीकात्मक तस्वीर - एआइ
UP News: प्रदेश सरकार ने चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने और एमबीबीएस के छात्रों को व्यावहारिक ज्ञान देने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम उठाया है। अब प्रदेश के राजकीय चिकित्सा महाविद्यालयों के साथ-साथ निजी मेडिकल कॉलेजों में भी पोस्टमार्टम (शव परीक्षण) की सुविधा शुरू की जाएगी। शासन के इस फैसले से न केवल मेडिकल छात्रों को मानव शरीर की संरचना समझने में आसानी होगी बल्कि फोरेंसिक मेडिसिन के क्षेत्र में उनकी पकड़ भी मजबूत होगी। इस संबंध में सभी जिलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों (CMO) को विस्तृत दिशा-निर्देश भेज दिए गए हैं।
अब तक पोस्टमार्टम की प्रक्रिया केवल जिला अस्पतालों और चुनिंदा सरकारी मेडिकल कॉलेजों तक ही सीमित थी। इस कारण निजी मेडिकल कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों को व्यावहारिक अनुभव के लिए काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। चिकित्सा शिक्षा को अधिक व्यावहारिक बनाने के लिए शासन ने यह नई पहल की है। अब छात्र अपनी पढ़ाई के दौरान सीधे तौर पर शव परीक्षण की बारीकियों को देख और समझ सकेंगे। इससे उन्हें मृत्यु के कारणों का गहन अध्ययन करने और अपराध विज्ञान (Criminology) को समझने में बड़ी मदद मिलेगी।
शासन ने निजी मेडिकल कॉलेजों को पोस्टमार्टम की अनुमति तो दी है लेकिन इसके साथ सख्त नियम भी लागू किए हैं। नए निर्देशों के अनुसार निजी मेडिकल कॉलेजों में केवल लावारिस शवों का ही पोस्टमार्टम किया जा सकेगा। किसी भी पोस्टमार्टम से पहले संबंधित जिले के सीएमओ से लिखित अनुमति लेना अनिवार्य होगा। इसके अलावा पूरी प्रक्रिया की निगरानी के लिए एक नोडल अधिकारी तैनात किया जाएगा ताकि नियमों का उल्लंघन न हो और पारदर्शिता बनी रहे।
पोस्टमार्टम की प्रक्रिया के दौरान मेडिकल कॉलेज के वरिष्ठ शिक्षकों और रेजिडेंट डॉक्टरों की उपस्थिति अनिवार्य की गई है। खास बात यह है कि पोस्टमार्टम मुख्य रूप से सरकारी चिकित्सकों द्वारा ही किया जाएगा जबकि मेडिकल छात्र उस दौरान उपस्थित रहकर शिक्षण प्राप्त करेंगे। बरेली के सीएमओ डॉ. विश्राम सिंह ने बताया कि चिकित्सा शिक्षा में प्रैक्टिकल नॉलेज का बहुत महत्व है। इस कदम से छात्र न केवल मानव शरीर की जटिलताओं को समझेंगे बल्कि फोरेंसिक साक्ष्यों को इकट्ठा करने की प्रक्रिया में भी निपुण बनेंगे।
इस नई व्यवस्था से मेडिकल कॉलेजों के डिसेक्शन हॉल (शव-विच्छेदन गृह) का उपयोग अब पोस्टमार्टम के लिए भी हो सकेगा। इससे एमबीबीएस और पीजी कर रहे छात्रों को केस स्टडी के लिए नया और वास्तविक डेटा मिल सकेगा। शासन का मानना है कि इस पहल से आने वाले समय में प्रदेश को बेहतर फोरेंसिक विशेषज्ञ मिलेंगे जो कानूनी और चिकित्सकीय जांच में अहम भूमिका निभाएंगे।
Updated on:
25 Feb 2026, 11:36 AM IST
Published on:
25 Feb 2026, 11:36 AM IST
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