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टेंडर के पहले ही दौड़ पड़े फाइबर के घोड़े, 3 का, 13 कर रहा ठेकेदार, रोटरी से सड़क भी हो गई संकरी

दामोदर स्वरूप पार्क चौराहे के पास लगाए जा रहे फाइबर के घोड़ों ने टेंडर सिस्टम की पोल खोल दी। आरोप है कि निविदा जारी होने से पहले ही करीब 70 फीसदी काम पूरा कर लिया गया। अब तीन लाख रुपये के वास्तविक काम पर 13 लाख रुपये का टेंडर चढ़ाने की तैयारी चल रही है। रोटरी बनने की वजह से वहां सड़क और संकरी हो गई है। आने वाले दिनों में ये रोटरी ट्रैफिक जाम का नया अडडा बनने जा रही है।

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बरेली। दामोदर स्वरूप पार्क चौराहे के पास लगाए जा रहे फाइबर के घोड़ों ने टेंडर सिस्टम की पोल खोल दी। आरोप है कि निविदा जारी होने से पहले ही करीब 70 फीसदी काम पूरा कर लिया गया। अब तीन लाख रुपये के वास्तविक काम पर 13 लाख रुपये का टेंडर चढ़ाने की तैयारी चल रही है। रोटरी बनने की वजह से वहां सड़क और संकरी हो गई है। आने वाले दिनों में ये रोटरी ट्रैफिक जाम का नया अडडा बनने जा रही है।

टेंडर बाद में, काम पहले, किसकी थी इतनी जल्दी

साइट पर फाइबर स्ट्रक्चर खड़े हो चुके थे, जबकि टेंडर प्रक्रिया औपचारिक रूप से पूरी भी नहीं हुई थी। जब काम पहले ही हो गया, तो निविदा किसलिए, विभागीय गलियारों में चर्चा है कि पसंदीदा फर्म के लिए रास्ता साफ करने की पटकथा पहले लिखी गई, कागज बाद में जोड़े गए। जानकारों का दावा है कि फाइबर घोड़ों का असल खर्च करीब 3 लाख के आसपास बैठता है, जबकि प्रस्तावित टेंडर 13 लाख के करीब है। आरोप यह भी कि बोली प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धा हतोत्साहित की गई।

ठेकेदारों को धमकाया, ज्यादा सक्रिय होने की जरूरत नहीं

इसी बीच एक फर्म ने लगभग 10 प्रतिशत ब्लो के साथ बोली डाली, जिससे गणित और उलझ गया। अब चर्चा है कि अनुबंध एक नाम पर, भुगतान दूसरे को कैसे कर दिया जाये।
ब्लो सेविंग से एक्स्ट्रा आइटम तक का फॉर्मूला ये है कि फरवरी-मार्च में सप्लाई ऑर्डर और एक्स्ट्रा आइटम के जरिए बजट खपाने का आरोप पुराना है। नियम कहता है कि टेंडर ब्लो से बची रकम मुख्यालय को लौटे। लेकिन यहां बचत का बड़ा हिस्सा एक्स्ट्रा आइटम और अतिरिक्त सप्लाई में समायोजित कर दिया जाता है।

सेतु मरम्मत में भी वही पटकथा

लोक निर्माण विभाग के भीतर चर्चा है कि कुछ सेतु मरम्मत कार्यों में भी अनुमान और आंकड़े एक ही घेरे में तैयार होते हैं। इंजीनियरिंग साइन-आफ तक सीमित रह जाती है, जबकि दरें और आइटम पूर्वनिर्धारित ढर्रे पर चलते हैं। यह मामला पीडब्ल्यूडी ठेकेदार के गठजोड़ की ओर इशारा करता है। पारदर्शिता पर उठे इन सवालों का जवाब विभाग को सार्वजनिक करना होगा। हालांकि इस मामले में ठेकेदार से बात की गई तो उसने सिरे से ही नकार दिया। कहा कि भाई साहब किसी ने आपको गलत जानकारी दे दी है। मैं तो काम ही नहीं कर रहा हूं। पीडब्ल्यूडी विभाग के कारनामे भी अजब गजब हैं।