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बीमारी से बचाव और जागरूकता मेडिकल कॉलेजों की जिम्मेदारी: देव मूर्ति

एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज में आयोजित दो दिवसीय पीडियाट्रिक एवं नियोनेटल अपडेट कार्यशाला में नवजात और बच्चों की बीमारियों के आधुनिक इलाज व रोकथाम पर मंथन हुआ। ट्रस्ट के चेयरमैन देव मूर्ति ने कहा कि शिशु मृत्यु दर घटाने के लिए नवजातों की पूरी जांच और जनजागरूकता बढ़ाने में मेडिकल कॉलेजों की बड़ी जिम्मेदारी है।

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बरेली। एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज में आयोजित दो दिवसीय पीडियाट्रिक एवं नियोनेटल अपडेट कार्यशाला में विशेषज्ञों ने बच्चों से जुड़ी बीमारियों के आधुनिक इलाज और रोकथाम पर विस्तार से चर्चा की। इस मौके पर एसआरएमएस ट्रस्ट के संस्थापक एवं चेयरमैन देव मूर्ति ने कहा कि नवजात शिशुओं की बीमारियों से बचाव और समाज में जागरूकता फैलाने की जिम्मेदारी मेडिकल कॉलेजों की भी है। उन्होंने कहा कि दूसरे देशों की तुलना में भारत में अभी बच्चों के इलाज के क्षेत्र में काफी सुधार की जरूरत है, जिसका एक बड़ा कारण नवजात शिशुओं की समय पर जांच न होना भी है।

नवजातों की जांच से घटेगी मृत्यु दर

देव मूर्ति ने कहा कि नवजात बच्चों की संपूर्ण जांच और उनके माता-पिता को इसके प्रति जागरूक करना बेहद जरूरी है। उन्होंने बताया कि एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज की स्थापना से ही यहां बीमारियों की रोकथाम पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इसी के तहत नवजात बच्चों की विस्तृत जांच की व्यवस्था की गई है और अभिभावकों को भी इसके महत्व के बारे में जानकारी दी जाती है। उनका कहना था कि समय पर जांच और उपचार से शिशु मृत्यु दर को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

‘डिकोडिंग चाइल्डहुड: अणु से आरोग्य तक’ रही कार्यशाला की थीम

एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज की ओर से अलखनंदा रिसोर्ट में 7 और 8 मार्च को आयोजित इस कार्यशाला की थीम “डिकोडिंग चाइल्डहुड: अणु से आरोग्य तक” रखी गई। शनिवार सुबह साढ़े आठ बजे पंजीकरण के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हुई। पीडियाट्रिक्स एवं नियोनेटोलॉजी विभाग की ओर से आयोजित इस कार्यशाला में देश के विभिन्न हिस्सों से आए बाल रोग विशेषज्ञों ने जेनेटिक्स, पीडियाट्रिक्स और नियोनेटोलॉजी से जुड़े अत्याधुनिक विषयों पर अपने अनुभव साझा किए।

मॉलिक्यूलर मेडिसिन से बदल रहा इलाज का स्वरूप

एसजीपीजीआई की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. शुभा फड़के ने “मॉलिक्यूलर मेडिसिन युग में बदलते निदान के प्रतिमान” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि जेनेटिक मेडिसिन और मॉलिक्यूलर मेडिसिन आधुनिक चिकित्सा का अहम हिस्सा बन चुकी हैं। इनके माध्यम से कई जटिल बीमारियों की पहचान शुरुआती चरण में ही संभव हो जाती है। खासकर नवजात शिशुओं से जुड़ी बीमारियों के इलाज में इन तकनीकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि इलाज के साथ-साथ बीमारी की रोकथाम पर ध्यान देना भी जरूरी है और इसके लिए मेडिकल शिक्षा में जेनेटिक मेडिसिन को शुरुआती स्तर से शामिल किया जाना चाहिए।

चिकित्सा और शोध के बीच की दूरी कम करने की पहल

कार्यशाला की आयोजन अध्यक्ष ब्रिगेडियर (सेवानिवृत्त) डॉ. वंदना नेगी ने अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि इस कार्यशाला का उद्देश्य चिकित्सकीय प्रैक्टिस और रिसर्च के बीच मौजूद अंतर को कम करना है। उन्होंने कहा कि बच्चों को बीमारियों से दूर रखने और उनके बेहतर स्वास्थ्य के लिए इस तरह के शैक्षणिक कार्यक्रम बेहद जरूरी हैं।

कॉलेज की उपलब्धियों और नई योजनाओं की जानकारी

कॉलेज के प्रिंसिपल एयर मार्शल (सेवानिवृत्त) डॉ. एमएस बुटोला ने मेडिकल कॉलेज की उपलब्धियों का जिक्र करते हुए बताया कि संस्थान में जल्द ही दो अत्याधुनिक ट्रामा यूनिट स्थापित की जाएंगी। इससे गंभीर मरीजों को बेहतर और त्वरित इलाज की सुविधा मिल सकेगी। कार्यक्रम के अंत में आयोजन सचिव डॉ. अतुल कुमार ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। संचालन डॉ. अर्चिता द्विवेदी ने किया। इस अवसर पर एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज के डायरेक्टर आदित्य मूर्ति, मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. आरपी सिंह, डीन यूजी डॉ. बिंदु गर्ग, डॉ. प्रेम कुमार, डॉ. संध्या चौहान, डॉ. गुंजन अग्रवाल, डॉ. सुरभि चंद्रा, डॉ. अमृत अग्रवाल, रूबी अहलावत सहित विभिन्न विभागों के चिकित्सक, विभागाध्यक्ष, इंटर्न, पीजी और एमबीबीएस के विद्यार्थी मौजूद रहे।

बच्चों की बीमारियों पर विशेषज्ञों ने रखे विचार

कार्यशाला में कर्नल डॉ. राहुल सिन्हा ने बच्चों में मिर्गी के दौरे की वर्तमान स्थिति पर चर्चा की। कर्नल डॉ. आराधना द्विवेदी ने नियोनेटल जेनोमिक्स के नवजात उपचार पर प्रभाव और क्लीनिकल प्रैक्टिस में एमपीएस-टू के निदान पर व्याख्यान दिया। डॉ. सफल मोहम्मद ने आनुवांशिक हीमोलिटिक एनीमिया की जेनेटिक्स, कर्नल डॉ. पुनीत सिंह ने आरटीए और ट्यूबलर डिसऑर्डर के जेनेटिक्स, जबकि कर्नल डॉ. आशीष सिमाल्ती ने पीआईसीयू के जटिल मामलों में गंभीर संक्रमण और सेप्सिस पर जानकारी दी। इसके अलावा डॉ. विवेक कुमार ने बच्चों में हेरिटेबल कार्डियोवैस्कुलर डिजीज की जेनेटिक टेस्टिंग, डॉ. शालिनी त्रिपाठी ने दुर्लभ जेनेटिक बीमारियों पर केस प्रेजेंटेशन और डॉ. प्रज्ञा काफिले ने लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर व गौचर डिजीज पर विस्तार से जानकारी दी।

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