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मीठी गोली, बड़ा असर: होम्योपैथी बनी हेल्थ का नया ट्रेंड, कोविड से लेकर खेत और पशुओं तक असरदार

विश्व होम्योपैथिक दिवस एक ऐसी चिकित्सा पद्धति का उत्सव है, जो ‘सम: समं समति’ के सिद्धांत पर आधारित है। यानी वही पदार्थ, जो बीमारी के लक्षण पैदा करता है, उसी को सूक्ष्म मात्रा में देकर रोग को खत्म किया जाता है।

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बरेली। विश्व होम्योपैथिक दिवस एक ऐसी चिकित्सा पद्धति का उत्सव है, जो ‘सम: समं समति’ के सिद्धांत पर आधारित है। यानी वही पदार्थ, जो बीमारी के लक्षण पैदा करता है, उसी को सूक्ष्म मात्रा में देकर रोग को खत्म किया जाता है।

इस क्रांतिकारी सोच के जनक सैमुअल हैनिमैन की जयंती पर दुनिया भर में इस पद्धति की उपयोगिता और प्रभाव पर चर्चा हो रही है। 1755 में जर्मनी में जन्मे हैनिमैन ने आधुनिक चिकित्सा की कठोरता से त्रस्त होकर होम्योपैथी की नींव रखी। आज यह पद्धति विश्वभर में लाखों लोगों के इलाज का माध्यम बन चुकी है और समग्र स्वास्थ्य—शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक संतुलन—पर जोर देती है।

‘कोविड में बरेली मॉडल: 2986 मरीजों को राहत का दावा’

कोविड-19 महामारी के दौरान बरेली में होम्योपैथी ने अपनी प्रभावशीलता का दावा किया। डॉ. विकास वर्मा के अनुसार, करीब 2986 मरीजों को स्वास्थ्य लाभ मिला। आर्सेनिकम एल्बम, एस्पीडोस्पर्मा और काली कार्ब जैसी दवाओं ने प्रतिरक्षा बढ़ाने और लक्षणों में सुधार में अहम भूमिका निभाई।

‘पेट से मानसिक रोग तक—हर मोर्चे पर इलाज का दावा’

ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरी अस्पतालों तक होम्योपैथी का दायरा तेजी से बढ़ा है। पेट के रोग, पीलिया, पथरी
गठिया, त्वचा रोग, एलर्जी, मानसिक विकार, इन बीमारियों में इस पद्धति से सफल उपचार के दावे सामने आए हैं। World Health Organization भी इसे पूरक चिकित्सा के रूप में स्वीकार करता है।

‘खेती-पशुपालन में एंट्री: एग्रो होम्योपैथी का नया मॉडल’

होम्योपैथी अब इंसानों तक सीमित नहीं रही। डॉ. विकास वर्मा को देश में एग्रो होमियोपैथिक के जनक के रूप में जाना जाता है। उनके शोध में पेड़-पौधों की बीमारियों के इलाज, रासायनिक जहर से मुक्ति और पशुपालन में बेहतर परिणाम के दावे किए गए हैं। यह पहल प्रधानमंत्री के ‘जहर मुक्त कृषि’ संकल्प को भी मजबूती देने की दिशा में देखी जा रही है।

‘सस्ती-सुरक्षित और अब सरकारी सिस्टम का हिस्सा’

भारत में केंद्रीय आयुष मंत्रालय के तहत होम्योपैथी को राष्ट्रीय मान्यता मिली है। कम लागत, आसान उपलब्धता और साइड इफेक्ट्स न होने के दावों के चलते यह पद्धति आम लोगों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है।

‘युवा आगे आएं, शोध बढ़े—तभी बनेगा मजबूत विकल्प’

विशेषज्ञों का मानना है कि होम्योपैथी को मुख्यधारा में और सशक्त बनाने के लिए जागरूकता अभियान, सेमिनार और रिसर्च को बढ़ावा देना जरूरी है, ताकि यह एलोपैथी के साथ मिलकर एकीकृत चिकित्सा प्रणाली का मजबूत आधार बन सके।