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आला हजरत के पीर घराने को दावत देने जाएंगे दरगाह प्रमुख सुब्हानी मियाँ

आला हजरत का तीन दिवसीय उर्स 13 नवंबर से शुरू हो रहा है। उर्स में शामिल होने के लिए देश विदेश के लाखों जायरीन बरेली पहुंचते हैं

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Urs Of Dargah Ala Hazrat

Urs Of Dargah Ala Hazrat

बरेली। आला हजरत का तीन दिवसीय उर्स 13 नवंबर से शुरू हो रहा है। उर्स में शामिल होने के लिए देश विदेश के लाखों जायरीन बरेली पहुंचते हैं, जिसके कारण उर्स की तैयारियां जोर शोर से चल रही हैं। दरगाह आलाहज़रत के प्रवक्ता मुफ़्ती सलीम नूरी ने बताया कि उर्से रज़वी की यह रस्म रही है, कि सज्जादानशीन की तरफ़ से हर साल दो तरह के दावतनामें तैयार होते हैं। एक आम दावतनामा होता है, जो पोस्टर, इस्लामिक मैगज़ीन, अखबार और सोशल मीडिया के माध्यम से सारे लोगों को दिया जाता है। दूसरा एक खास दावतनामा तैयार होता है, जो सिर्फ आलाहज़रत के पीर घराने खानकाहे बरकातिया मारहरा शरीफ़ के बुजुर्गों और सज्जादगान को दावत दी जाती है।

दरगाह प्रमुख जाएंगे दावत देने
उसकी वजह यह है कि खानकाहे रज़विया के सारे बुजुर्ग और खुद आलाहज़रत और उनके वालिद अल्लामा नक़ी अली खाँ अलैहिर्रहमा मारहरा शरीफ़ से ही मुरीद थे इसी वजह से खानकाहे रज़विया के सारे अहम फैसले खानकाहे बरकातिया के बुजुर्गों द्वारा ही किये जाते हैं विशेष रूप में दरगाह प्रमुख सुब्हानी मियाँ तो अपने सारे विशेष और अहम काम खानकाहे बरकातिया मारहरा शरीफ के सज्जादगान के मशवरे से ही करते हैं। बल्कि दरगाह प्रमुख सुब्हानी मियाँ इस्लामियाँ ग्राउन्ड में होने वाले उर्से रज़वी का सरपरस्त भी खानकाहे बरकातिया के सज्जादानशीन हज़रत सय्यद अमीन मियाँ और खानकाहे बरकातिया नूरिया के सज्जादानशीन हज़रत सय्यद नजीब मियाँ को बनाते हैं। उर्स की सरपरस्ती की दावत देने किसी दूसरे को नहीं भेजते बल्कि हर साल सुब्हानी मियाँ उल्मा के प्रतिनिधिमण्डल के साथ खुद दावत देने मारहरा शरीफ जाते हैं।

पहुंचने लगे जायरीन
इस बार उर्से कासमी मारहरा शरीफ चूंकि 5 नवम्बर रविवार को है, उर्से रज़वी से उर्से कासमी करीब होने की वजह से पूरी दुनिया में बसे रज़वी और बरकाती इस बार बहुत पहले ही से आना शुरू हो गये हैं हाल यह है कि अभी उर्से रज़वी में लगभग 10 दिन बकी हैं मगर देश-विदेश के ज़ायरीन के जत्थे दरगाहे आलाहज़रत पहुंचने लगे हैं। जायरीन के इन जत्थों ने बताया कि इस बार हम इसलिए पहले आ गये हैं ताकि मारहरा शरीफ़ के उर्से कासमी में भी शिरकत हो जाएं और उर्से रज़वी में भी हम सम्मिलित हो जाएं।

उर्स क़ासमी के मौके पर दरगाह पर सजी कुल शरीफ़ की महफ़िल
मरकजे़ अहले सुन्नत दरगाह आला हज़रत का इमाम अहमद रज़ा ख़ान फ़ाज़िले बरेलवी अलैहिर्रहमा के पीर घराने ख़ानक़ाहे बरकातिया मारेहरा शरीफ़ से बहुत ही गहरा रूहानी संबंध रहा है। आला हज़रत के घराने के ज़्यादातर बुजुर्ग इसी ख़ानक़ाह के मुरीद और ख़लीफ़ा रहे हैं। इसी वजह से जब भी ख़ानक़ाहे बरकातिया मारेहरा शरीफ़ में किसी बुजुर्ग का उर्स होता है तो उस की महफ़िल दरगाह आला हज़रत पर भी सजाई जाती है और दरगाह आला हज़रत के सज्जादा नशीन मारेहरा शरीफ़ में होने वाले उर्सो में ज़रूर शिरकत करते हैं। इस साल के उर्से क़ासमी के मौके पर रिवायती अंदाज़ में एक महफ़िल का आयोजन किया गया जिसकी सरपरस्ती दरगाह प्रमुख सुब्हानी मियां ने की और अध्यक्षता हज़रत अहसन मियां ने की।

सुनाया गया पैगाम
इस मौके पर सुब्हानी मियां का पैग़ाम सुनाते हुये मुफ़्ती सलीम बरेलवी ने कहा कि साहिबे उर्से क़ासमी हज़रत सय्येदिना इस्माईल हसन अलैहिर्रहमा जिनकी याद में 5 नवम्बर को 91वें वां मारहरा शरीफ़ में उर्से क़ासमी हो रहा है,उनका आला हज़रत से बेहद गहरा सम्बन्ध था और 1919 ई0 के आसपास हिन्दुस्तान में चलने वाली हर तहरीक में वह आला हज़रत के साथ थे आला हज़रत के हर मज़हबी, मसलकी और क़ौमी व मिल्ली कामों में वह आला हज़रत की हिमायत करते थे और हर तरह से मदद भी किया करते थे। आला हज़रत भी इन शख़्सियत से बेपनाह मोहब्बत रखते थे। इसी तरह आला हज़रत के दोनो शहज़ादों से भी उनके गहरे सम्बन्ध थे। शुद्धी तहरीक के ज़माने में हज़रत इस्माईल हसन मियां ने आला हज़रत और मुफ़्ती आज़म हिन्द की हर तरह से मदद की थी। मंज़रे इस्लाम के छात्रों और शिक्षकों ने इस जश्न में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। हज़रत अहसन मियां ने दुआ की और सब लोगों को उर्से क़ासमी की मुबारकबाद दी।


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