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बचपन में झेला मृत्युभोज का दंश, अब समाज को दिखाई नई राह

-पिता की मृत्यु पर नहीं बनाए पकवान, पांच लाख दिए शिक्षा को

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बाड़मेर. बाड़मेर जिले के बीसू कला गांव के रहने वाले व्याख्याता वेदाराम मेघवाल ने समाज को नई राह दिखाई है। मेघवाल ने मृत्युभोज की सामाजिक परम्परा को तोड़ते हुए पिता के बारहवें पर शैक्षिक कार्यों के लिए पांच लाख रुपए देने व मृत्यु पश्चात स्वयं व पत्नी वीरोंदेवी की देह मेडिकल कॉलेज को दान देने का ऐलान किया। व्याख्याता के इन सभी निर्णयों की सामाजिक स्तर पर सराहना हो रही है।
राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय निम्बाणियों की ढाणी में कार्यरत अंग्रेजी व्याख्याता वेदाराम मेघवाल के पिता डाउराम का 26 दिसम्बर को स्वर्गवास हो गया था। छह जनवरी को उनका बारहवां था। परम्परानुसार बारह दिन पर मीठा जीमण (पांच पकवान) किया जाना था। व्याख्याता वेदाराम ने अपने परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों व सामाजिक पंचों को सहमत किया कि मृत्युभोज नहीं किया जाए। हालांकि सभी ने सहमति नहीं दी, लेकिन वह अपने निर्णय पर अडिग रहे और मृत्युभोज नहीं किया। उन्होंने अपने पिता की स्मृति में मेघवाल समाज शोध एवं शैक्षिक संस्थान बाड़मेर को डेढ़ लाख रुपए, मेघवाल समाज छात्रावास शिव को डेढ़ लाख रुपए, बालिका छात्रावास झालामंड जोधपुर को एक लाख रुपए एवं अध्ययन गोद योजना के तहत दो छात्रों को पचास-पचास हजार रुपए दिए।

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इसलिए लिया देहदान का निर्णय
वेदाराम ने बताया कि उनके पिता अपने आखिरी समय में करीब ढाई महीने तक एमडीएम अस्पताल जोधपुर में रहे। इस दौरान वह निरंतर अपने पिता की सेवा में रहे। वहां उन्होंने चिकित्सकों को मानव सेवा करते नजदीक से देखा। तब उन्होंने व पत्नी ने निर्णय लिया कि मृत्यु पश्चात वह अपनी-अपनी देह दान करेंगे ताकि वह मानवता के लिए काम आ सके।

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पढ़ाई का ही नशा
वेदाराम 1998 से शिक्षा विभाग में शिक्षक के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। वह स्वयं व उनके परिवार का कोई भी सदस्य चाय तक नहीं पीता। नशे से दूर रहते हुए उन्हें केवल पढ़ाने का नशा है।
वह अपने विद्यालय के छात्रों को बोर्ड परीक्षा के दिनों में सुबह चार बजे फोन कर जगाते हैं। बीते सात वर्ष से मेघवाल समाज शैक्षणिक एवं शोध संस्थान में बतौर वार्डन अवैतनिक सेवाएं दे रहे हैं। स्वयं यूनिफॉर्म में विद्यालय जाते हैं। खाकी पेंट, सफेद शर्ट, समय की पाबंदी, सादगी व अनुशासनप्रियता उनकी पहचान है।
बचपन में झेला मृत्युभोज का दर्द
वेदाराम ने बताया कि उन्होंने बचपन से ही मृत्युभोज का दर्द झेला। उनके दादा की मृत्यु के पश्चात हुए भोज का कर्ज परिवार ने दो दशक तक ढोया। आस-पास कई परिवारों ने मृत्युभोज के पश्चात अपनी पुश्तैनी जमीनें तक बेच डाली। आज भी यह सिलसिला जारी है। वेदाराम कहते हैं कि समाज को बदलाव की जरूरत है और आर्थिक रूप से सक्षम हो चुके परिवारों को इस बदलाव का वाहक बनने के लिए आगे आना होगा।