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-बाड़मेर के गडरारोड़ में रुके थे अटल बिहारी वाजपेयी

1971 में अटल के इरादे से यहां बसे थे हिन्दू शरणार्थी

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बाड़मेर के गडरारोड़ में रुके थे अटल बिहारी वाजपेयी

बाड़मेर के गडरारोड़ में रुके थे अटल बिहारी वाजपेयी

गडरारोड़ (बाड़मेर )पत्रिका.

1971 के युद्ध में भारत ने पाकिस्तान पर फतह प्राप्त की थी। दोनों देशों के बीच शिमला समझौते के तहत तय हो गया कि छाछरो तक जहंा भारत की सेनाएं पहुंच चुकी थी वहां से सेनाएं हटा दी जाएगी लेकिन इस दौरान पाकिस्तान से बड़ी संख्या में हिन्दू शरणार्थी भारत के गडरारोड़ तक आ गए। इन शरणार्थियों को वापस पाकिस्तान भेजने का भारत सरकार ने निर्णय कर लिया। शरणार्थियों का साथ देने वाला कोई नहीं था। जनसंघ के नेता अटलबिहारी वाजपेयी को यह जानकारी मिली तो वे यहां पहुंच गए। वाजपेयी 3 दिन तक गडरारोड़ में रहे। यहां उन्होंने शरणार्थियों की पीड़ा को सुना और समझा। यहां से जाते ही वाजपेयी ने अपने तेज तर्रार अंदाज में संसद में इस मामले को उठाया। उन्होंने उस समय कहा कि वे तीन दिन तक वहां रहे हंै। हिन्दू शरणार्थी भारत रहना चाहते हैं और उन्हें यहां रहने दिया जाए। वाजपेयी के तर्क इतने सटीक थे कि इसके बाद सरकार ने निर्णय किया कि शरणार्थियों को यहीं शरण मिलेगी। 13000 के करीब शरणार्थी 1971 के युद्ध बाद यहां आकर बसे। अटल बिहारी के संघर्ष में साथी बने ताणुरावजी गांव के शोभसिंह भाटी बताते है कि शरणार्थियों को पांच घंटे में पाकिस्तान भेजने के आदेश थे। अटल बिहारी यहां आकर अडिग रहे और फिर संसद में जिस तरह से पैरवी की तो शरणार्थियों को पाकिस्तान भेजने का निर्णय सरकार को वापस लेना पड़ा।

कोजराज महेश्वरी के घर रुके थे अटल

जनसंघ का उस समय साथ देना हिम्मत का काम था। गडरारोड के कोजराज महेश्वरी ने अपने घर पर अटल बिहारी के रुकने का इंतजाम किया और तीन दिन तक यहीं पर उन्होंने भोजन किया। कोजराज के भाई नंदलाल महेश्वरी बताते है कि अटल बिहारी वाजपेयी यहां सादा खाना खाते हुए रहते थे।

आराबा में अनाज वितरित किया

बाड़मेर पत्रिका.

1981 में बाड़मेर जिले में अकाल था तो अटल बिहारी वाजपेयी अनाज के साथ यहां पहुंचे। उन्होंने आराबा गांव के बस स्टैंड पर सभा को संबोधित किया। अपने हाथों से अनाज बांटते हुए कहा कि आप लोग मेहनत से अनाज उपजाकर देश की सेवा करते हैं, आज आप पर संकट है तो मुझे यह अवसर मिला है। फिक्र नहीं करें अकाल में मदद में कोई कमी नहीं आने दी जाएगी। गांव की पानी की समस्या को लेकर मोहन महाराज ने अपनी बात रखी तो वे उनके अंदाज पर बोले कि-बात कहने का तरीका अच्छा लगा। गांव में करीब दो घंटा रुकने के बाद बालोतरा और कनाना के लिए रवाना हो गए। उन्होंने 1983 में भी सुध ली और आराबा आए व लोगों से बात की थी। - उम्मेदसिंह आराबा, पूर्व सरपंच

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