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बाड़मेर. मां के पास कुल जमा साठ रुपए थे, इन रुपयों से तीन मासूमों के लिए पटाखे खरीदे थे। पिता के पास दिहाड़ी मजदूरी से पांच सौ रुपए आए थे जिससे किराणे का कुछ सामान जुटा था। दूसरा बेटा शाम को चार सौ रुपए मजदूरी लेकर आने वाला था। तिनका-तिनका जोड़कर तीन कच्चे झोंपे इस साल बनाए थे और परिवार की तीनों महिलाओं ने दीपावली से पहले गोबर और मिट्टी से लीपकर इनको तैयार किया था। कच्चे झोंपों को दीपावली को लक्ष्मी आने के उत्साह में मिट्टी से ही रंगोली सजाकर तैयार किया था। छोटी-छोटी जरूरतों को संजोकर एक परिवार अपनी दीपावली मनाने की तैयारी में था और झोंपों में आग लग गई। घर जलकर स्वाहा हो गया। परिवार आसमां तले आ गया। परिवार की मुखिया महिला लीलादेवी कहती है- भले ही कच्चा था, गोबर से लिपा था पर मेरा तो घर था..।
शहर के नजदीक रहने वाले गुलाबाराम सांसी के परिवार में भी गुरुवार को दीपावली मनाने का उत्साह था। दोनों बेटे अपने-अपने हिस्से की मजदूरी से इतना सामान लाए थे कि उनके घर में दीपावली को कुछ मीठा बन जाए और छोटा सा परिवार अपनी खुशियों को अपने तरीके से मना ले लेकिन उन्हें क्या मालूम कि यह दिवाली उनको आंसू देने वाली है। दीपावली को साढ़े चार बजे परिवार की महिलाएं चाय बना रही थीं और दिहाड़ी पर गए पुरुष सदस्यों के आने का इंतजार था तभी अचानक चूल्हे की आग से एक लपट निकली और कच्चे झोंपे को घेर लिया। महिलाएं कुछ समझ पाती तब तक तेज हवा ने संभलने का मौका नहीं दिया और तीनों ही झोंपे एक एक कर जलने लगे। महिलाएं पहले तो चिल्लाई लेकिन फिर ख्याल आते ही अंदर फंसे तीनों मासूम बच्चों को बचाने के लिए दौड़ पड़ी और जलती आग में से इनको हिम्मत दिखाकर बाहर ले आई। तब तक इन झोंपों में रखा सारा सामान स्वाह हो गया। तीन बिस्तर और दो चारपाई ही बच पाई। दीपावली के दिन आई इस आफत ने परिवार पूरे को आसमां तले ला दिया।
बड़ी मुश्किल से बनाए थे
गुलाब की पत्नी लीलादेवी ने बताया कि उन्होंने इसी साल तीन झोंपे नए बनाए थे। इनको दीपावली से पहले गार-गोबर कर तैयार किया था। यह उनकी दुनियां थी। वह रोती हुई कहती है कच्चा और छोटा ही सही मेरा तो यही घर था। अब घर कहां रहा? मेरा सबकुछ जलकर स्वाह हो गया। कुछ नहीं बचा है। गनीमत रही बच्चे बच गए।
पत्रिका की पहल पर हुई मदद
दीपावली पर इस परिवार में आफत आई तो तत्काल मदद की दरकार थी। दीपावली को तो गांव के लोगों ने कुछ मदद की लेकिन दूसरे दिन जागरूक नागरिक महावार निवासी तनसिंह ने पत्रिका से संपर्क कर जानकारी दी। पत्रिका की पहल पर इंडिया अगेंस्ट वॉयलेंस व बाड़मेर जैन रिफोम्र्स के मुकेश बोहरा अमन व उनकी टीम के सदस्यों ने तुरंत मौके पर पहुंच कर पीडि़त परिवारों के खाने की व्यवस्था की। इसके बाद रसोई, कपड़े व बर्तन सहित कई वस्तुएं देकर सहायता की। मददगारों में राकेश बोथरा, जोगेन्द्र वडेरा, मुकेश धारीवाल, दिनेश भंसाली, दिनेश बोहरा, अशोक संखलेचा, कुस्टमल भंसाली, गौतम भंसाली, मेघराज श्रीश्रीमाल शामिल रहे।
अब भी मदद की दरकार
गुलाबाराम व उसके दोनों पुत्र अब तीनों झोंपे वापिस खड़े करने और जरूरी गृहस्थी का सामान जुटाने को मोहताज हैं। रोज कमाकर रोज खाने इन लोगों को अब भी मदद की दरकार है ताकि इनके परिवार के सिर पर फिर से छत आए।
Updated on:
22 Oct 2017 12:26 pm
Published on:
22 Oct 2017 12:23 pm
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