
children said- Uncle does not listen to our talk,We also have issues
बच्चों ने कहा-अंकल हमारी बात कोई क्यों नहीं सुनता, हमारे भी हैं मुद्दे
बाड़मेर ञ्च पत्रिका . भले ही आज वे मतदाता नहीं हैं, लेकिन आने समय में मजबूत लोकतंत्र में उनकी भूमिका होगी। अभी स्कूल और आंगनबाड़ी में शिक्षा ले रहे बच्चों की समस्याएं और मुद्दे हैं, जिनकों हमेशा अनेदखा किया जाता है। आंगनबाड़ी का ही उदाहरण लेते हैं तो जहां स्कूलों में दीपावली के 10-15 दिनों के अवकाश मिले वहीं आंगनबाड़ी के बच्चों को दिवाली पर केवल दो दिन अवकाश था। बच्चों से बात करने पर उनकी कई समस्याएं और मुद्दे सामने आए। बच्चों से बातचीत पर आधारित पत्रिका टीम की खास रिपोर्ट...
शहर के माल गोदाम रोड के राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय की 8वीं क्लास में पहुंचे तो यहां बच्चे पढ़ाई करते मिले। टीम ने उनसे उनके मुद्दे और समस्याएं पूछी। बच्चे अपनी मन की बात कहते हुए बोले कि उनकी वैसे कम ही सुनी जाती है। उनकी समस्याएं केवल स्कूलों को लेकर ही नहीं है। सुविधाओं को लेकर भी है। चाहे गांव में रहें या फिर शहर और कस्बा। सभी जगह बच्चों को लेकर अनदेखी नजर आती है। बच्चों को सबसे अधिक खेलना पसंद होता है, लेकिन टॉय पार्क तो यहां दूर तक नजर नहीं आते हैं। हमारे स्कूल में अन्य प्रदेशों से पढऩे वाले बच्चे बताते हैं कि उनके शहर में ऐसे पार्क हैं तो वहां बन सकते हैं तो हमारे यहां क्यूं नहीं बनाए जाते हैं।
नियमित हो स्कूल परिसर की सफाई
बच्चों की यह समस्याएं स्कूल और आंगनबाड़ी में साफ दिखाई दे रही थी। कहीं पर भी अच्छी तरह से सफाई होती हो, ऐसा कुछ नजर नहीं आया। जगह-जगह कचरा बिखरा था। बच्चे बोले, सुविधाएं तो पता नहीं कब बढ़ेगी लेकिन क्लास व परिसर में सफाई तो करवाई ही जा सकती है। टायलेट बहुत गंदा रहता है।
बस्ते का बोझ कब तक सहेंगे
हमारे बस्ते इतने भारी हैं कि इनको उठाकर स्कूल तक पहुंचना परेशानी बना हुआ है। लेकिन मजबूरी में बस्ते लेकर आना-जाना पड़ता है। क्लास अगर स्मार्ट हो जाए तो बस्ते का बोझ कुछ कम हो सकता है। कई बच्चों ने बताया कि पीठ दर्द होने लगता है।
हमारी क्लास हो स्मार्ट
सरकारी स्कूल के बच्चे बताते हैं कि क्लास में कई बार तो दरी तक नहीं होती है। हम फर्श पर बैठकर पढ़ते हैं। सरकारी स्कूलों में भी बच्चों की सुविधाएं बढ़ाते हुए टेबल और बैंच लगनी चाहिए। हम चाहते हैं हमारी क्लास भी स्मार्ट हो और प्रोजेक्टर के माध्यम से पढ़ाई हो। सुविधाएं मिलेंगी तो आगे बढ़कर दिखा सकते हैं।
आठवीं से क्यूं नहीं मिलती साइकिल?
सरकारी स्कूल में पढऩे वाली कई बालिकाएं दूर से आती हैं। उनकी समस्या यह है कि तीन-चार किमी दूर से आने पर उनको भारी परेशानी होती है। हमें आठवीं क्लास में आने पर साइकिल क्यूं नहीं मिलती है।
बच्चों ने बताई मन की बात- बोले, हमारी भी समस्याएं और मुद्दे, आज नहीं तो कल तो होगी हमारी भी लोकतंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका
जिले में
यह है स्थिति
26 लाख 3051 आबादी
16 लाख 53 हजार 960 मतदाता
07 लाख 76 हजार 332 महिला मतदाता
08 लाख 89 हजार 628 पुरुष मतदाता
10 लाख हैं 18 से कम उम्र के
बच्चों ने इस पर की बात
शहर और गांवों में होने चाहिएं पार्क
व्यायाम के लिए साइकिल ट्रैक की सुविधा मिले
स्कूलों में सारे पद भरे जाएं और सरकारी पढ़ाई हो बेहतर
टॉयज स्कूल हों सरकारी विद्यालयों में जहां पढ़े छोटे बच्चे
मेडिकल और हैल्थ जांच के लिए स्कूलों के लिए अलग हो मेडिकल स्टाफ
सरकारी स्कूलों की भी यूनिफार्म हो प्राइवेट की तरह अप टू डेट
स्मार्ट हो सरकारी स्कूल की क्लास, सभी में लगें प्रोजेक्टर
सरकारी शिक्षण संस्थानों की नियमित हो सफाई
बड़ी क्लास की तरह आठवीं से प्रतिभाशाली बालिकाओं को मिले साइकिल
आंगनबाड़ी में हो सरकारी स्कूल की तरह छुट्टियां
बच्चे बोले
&स्कूलों की स्थिति में सुधार होना चाहिए। बच्चों का समग्र विकास कैसे हो सकता है। इसके बारे में सोचना होगा। उनको खेलकूद के अवसर बचपन से मिलने चाहिएं, यही हमारा मुद्दा है।
विशाल, छात्र
&बालिकाओं के विकास को लेकर काम होना चाहिए। साइकिल आठवीं क्लास से मिलनी चाहिए। बेहतर शिक्षा महत्वपूर्ण मुद्दा है।
वंदना, छात्रा
&स्कूल में ही खेलकूद के लिए कोई व्यवस्था नहीं हैं। हमारे शहर में बच्चों के लिए ऐसी कोई जगह नहीं है। बच्चों के लिए टॉय पार्क जैसे स्थान विकसित होने चाहिए।
प्रिंस, छात्र
&आठवीं क्लास से बालिकाओं को साइकिल मिलनी चाहिए। कई बहुत दूरी से आती हैं। ऐसे में उन्हें परेशानी होती है। कई मुद्दों पर काम करने की जरूरत है।
-थलसूम, छात्रा
नन्हे-मुन्नों को नहीं मिलती छुट्टियां
आंगनबाड़ी केंद्रों में 3-6 वर्ष के बच्चों को पढ़ाया जाता है। पहले तो इन केंद्रों पर भी सुविधाओं की कमी है। बच्चों के लिए टायलेट आदि की मूलभूत सुविधाएं नहीं मिलती। यहां पढऩे वाले बच्चे काफी छोटे होते हैं। केंद्र भेजने का उद्देश्य यह है कि बच्चे खेल-खेल में कुछ सीखें और खुले माहौल में कुछ बड़ा होने पर स्कूल जाने के लिए तैयार हो सकें। जबकि अधिकांश केंद्रों पर छोटे से कक्ष में पढऩे और सीखने वाले बच्चों का दड़बे जैसे हालतों में कैसे विकास होगा, यह सोचनीय लगा। सर्दी की छुट्टियां केवल 10 मिलती हैं, वे भी पिछले साल से शुरू हुई हैं। दीवाली, होली पर केवल पर्व को अवकाश होता है, आगे पीछे छह-सात दिन छुट्टी होनी चाहिए। लेकिन नन्हें-मुन्ने इनसे वंचित हैं।
Published on:
20 Nov 2018 09:15 am
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