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खजूर की खेती में किसान को मादा के साथ नर पौधा लगाना बेहद जरूरी…पढ़िए पूरी खबर

- खजूर की पैदावार भरपूर, बाजार का अभाव - किसान औने-पौने दाम में बेचने को मजबूर- प्राकृतिक वातावरण, जल की दृष्टि से खजूर सर्वाधिक अनुकूल फसल - कम बिकवाली पर किसान खेती में नहीं ले रहे रुचि

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Compulsory male plant with date farming

Compulsory male plant with date farming

बालोतरा. किसानों को खजूर की बुवाई के लिए सरकार के प्रेरित करने, लेकिन बाजार उपलब्ध नहीं करवाने पर अच्छी पैदावार के बावजूद किसान कमाई को तरस गए हैं। औने-पौने दामों में बिकती खजूर पर किसान इसकी बुवाई में रुचि नहीं ले रहे हंै। जबकि क्षेत्र का प्राकृतिक वातावरण व उपलब्ध पानी ये दोनों ही इसकी बुवाई, पैदावार के लिए अनुकूल है।

कृषि विभाग के राष्ट्रीय बागवानी मिशन में किसानों को खजूर के बगीचे लगाने के लिए प्रेरित करने व 70 फीसदी अनुदान पर इजरायल पद्धति से तैयार खुनेजी, खलास, मेटजून, बरही किस्म के पौधे उपलब्ध करवाने से क्षेत्र के मिठौड़ा, पादरू, धनवा आदि कई गांवों के चुनिंदा किसानों ने पौधे लगाए। इनकी मेहनत पर पौधे खूब फले फूले। वृक्षों का आकार ले चुके ये पौधे हर किसी को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हंै।

कम खर्च-मेहनत,भरपूर पैदावार-

किसानों के अनुसार खजूर की खेती में अधिक मेहनत व पैसों की जरूरत नहीं रहती है। क्योंकि इसमें रोग न के बराबर लगते हैं। कीटनाशी दवाइयों का छिड़काव नहीं करना पड़ता है। पौधा लगाने के तीसरे वर्ष पहली पैदावार मिलती है। ्रप्रति पौधा 8 से 10 किलो खजूर पैदा होती है। इसके हर वर्ष बाद पैदावार बढ़ती है। अच्छे तैयार वृक्ष पर प्रति वृक्ष 1 से 1.5 क्विंटल पैदावार तक मिलती है।

मादा -नर पौधा लगाने जरूरी-

खजूर की खेती में किसान को मादा के साथ नर पौधा लगाना बेहद जरूरी होता है। खजूर के नर-मादा वृक्ष पर फरवरी में फूल लगते हैं। इस दौरान नर वृक्ष के फूल को तोड़कर मादा वृक्ष पर रखना पड़ता है। इससे होने वाली परागगण प्रक्रिया पर जुलाई में फल लगते हैं। यह प्रक्रिया नहीं करने पर वृक्षों में फल नहीं लगते हैं। इस पर किसान कुछ नर पौधे लगाते हैं।

मेहनत का नहीं मिल रहा सही दाम -

क्षेत्र का प्राकृतिक वातावरण व उपलब्ध लवणीय पानी खजूर की खेती के लिए अनुकूल है। इससे अच्छे वृक्ष तैयार होते व भरपूर पैदावार मिलती है। लेकिन स्थानीय स्तर पर बाजार नहीं होने, कमजोर बिकवाली, बड़े शहरों की अधिक दूरी, महंगा ट्रांसपोर्ट किराया पर किसानों को 35 से 50 रुपए प्रतिकिलो भाव से इन्हें बेचनी पड़ती है। इस पर किसान इसकी बुवाई में रुचि नहीं ले रहे हैं।

बाजार नहीं होने से किसानों की रुचि कम -

खजूर की खेती हर दृष्टि से अच्छी है। मेहनत व खर्च न के बराबर लगता है। लेकिन स्थानीय स्तर पर बाजार नहीं होने पर बिकवाली बहुत कमजोर हैं। पैदावार शहर ले जाकर औने-पौने कीमत में बेचनी पड़ती है। सरकार खेती को बढ़ावा देने के लिए बाजार उपलब्ध करवाएं।

- पूराराम जाट, प्रगतिशील किसान मिठौड़ा

सही मार्ग दर्शन की जरूरत-

किसानों को खजूर खेती के लिए प्रेरित करने के बाद जिम्मेदार इस ओर झांकते तक नहीं है। कृषि विभाग, कंपनी के अधिकारी कोई मार्गदर्शन तक नहीं करते हैं। इस पर इसकी खेती में किसान रुचि नहीं ले रहे हैं। जबकि क्षेत्र की प्रकृति, जल के अनुरूप यह बागवानी की यह सबसे अच्छी खेती है।

- हनुमानराम चौधरी, प्रगतिशील बुड़ीवाड़ा


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