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खतरे में थार का पर्यावरण, कट गए रेत के समंदर और पहाड़

पर्यावरण दिवस विशेष

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Environment Day Special in barmer

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बाड़मेर. आज इंसान अपने मतलब के लिए पर्यावरण पर गहरा प्रहार करता जा रहा है। रेगिस्तान और पहाड़ों के लिए पहचान रखने वाली थार नगरी को कुरूप बना दिया है। यहां रेत के टीले अपना अलग वजूद प्रदेश भर में रखते हैं। यहां के टीले कभी तो संगीत मय ध्वनि से वातावरण में मिठास पैदा करते हैं। वहीं थार की पहाडिय़ां सुंदरता के साथ युद्ध के समय सेना की सहायक भी बनती हैं। पर अब रेत के समंदर समाप्त किए जा रहे हैं। पहाड़ अवैध खनन की भेंट चढ़ रहे हैं। रेगिस्तान का पर्यावरण खतरे में आ चुका है।

यहां कट गए पहाड़, खत्म हुई ओरण
जिले में अवैध खनन ने पर्यावरण को सर्वाधिक नुकसान पहुंचाया। खनन माफिया ने बड़े-बड़े पहाड़ों को काट कर साफ कर दिया। पहाड़ी क्षेत्र में ओरण भूमि बंजर हो गई। हजारों पेड़-पौधे खत्म हो गए। जिले के दरुड़ा, मारुड़ी, लुणु, मांगता, निम्बली, निम्बलकोट, चौहटन, सिवाना, बिशाला, भादरेश सहित कई गांवों में अवैध खनन माफियाओं ने पैर पसार दिया और पहाड़ों पर मशीनरी के कब्जे से प्रदूषण फैलता गया।

रक्षक बने भक्षक, चर रहे हैं गोचर
जिले में गोचर के लिए संरक्षित जमीन के लिए अब सरकारी नीति ही घातक बन रही है। गोचर की जमीन को गांव-गांव में सड़क, भवन और विभिन्न सरकारी कार्यो के लिए धड़ल्ले से आवंटित किया जा रहा है। आवंटन को लेकर पशुधन कम होने का हवाला दे दिया जाता है। यहां गोचर की जमीन पहले आवंटित ही नहीं की जा सकती थी लेकिन अब प्रति पशु आधा बीघा जमीन गोचर होनी चाहिए। गोचर के लिए जमीन अलग से संरक्षित तो नहीं की जा रही है लेकिन जहां गोचर की ज्यादा जमीन है वहां आवंटित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। जहां सड़क और मार्ग निकालते होते हैं वहां यही प्रमाण पत्र लेकर इतिश्री कर देते हैं कि यहां पधुशन कम है।

जिले में गोचर की मौजूदा स्थिति (जमीन बीघा मेंं)

चौहटन- 56,317.19
सिवाना- 15,197.28

गुड़ामालानी-25,625
सिणधरी- 17,762

सेड़वा-64,862.03
बायतु-6,445.01

पचपदरा-51,289.13
बाड़मेर- 37,033.19

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जमीन अवाप्त होती गई पेड़ कटते गए

जिले में पिछले डेढ़ दशक में जमीन अवाप्ति ने यहां के पर्यावरण संतुलन को गड़बड़ा दिया है। भादरेस क्षेत्र में लिग्नाइट पावर प्रोजेक्ट के लिए 55 हजार बीघा जमीन अवाप्त की गई। इस जमीन पर लाखों पेड़ लगे हुए थे। संबंधित कंपनी को यहां वापस पेड़ लगाने थे लेकिन इतनी संख्या में नहीं लगाए गए। तेल-गैस के लिए भी कंपनियों ने अवाप्त जमीन से पेड़ काट लिए लेकिन लगाए नहीं। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना व अन्य योजनाओं में सड़कों का जाल बिछाया गया है। संबंधित ठेकेदारों ने यहां पर भी पेड़ नहीं लगाए हैं। इसके अलावा सोनड़ी, गिरल लिग्नाइट खदान क्षेत्र में पेड़-पौधों को भारी नुकसान हुआ।
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ओरण की बिगाड़ दी सूरत

थार में सदियों से पशुधन जीवन का मुख्य आधार है। अभी जिले में 55 लाख से अधिक पशु हैं और सदियों पहले यह संख्या इससे तीन गुणा ज्यादा थी। एक-एक घर में पचास- सौ पशुओं के टोळे थे। इनके लिए चारे-पानी का इंतजाम बहुत बड़ी समस्या थी। बरसात होने पर तालाबों में पानी आ जाता लेकिन चरागाह कहां बनें? इस पर समुदाय और ग्रामीणों ने मिलकर एक पूरे भूभाग को ओरण का नाम दे दिया,जहां केवल पशुओं के चरने व विश्राम को ही जमीन रखी गई। इस ओरण पर अन्य कोई गतिविधि नहीं हो इसके लिए इष्ट देवी- देवता का नाम ओरण को दे दिया जिसके भय से लोग यहां से तिनका भी नहीं उठा पाते।


ओरण-गोचर से कम हो गए पशु-पक्षी

ओरण में गोडावण, तीतर, बटेर, हरिण, खरगोश, नेवला, तीतर, कबूतर, गौरेया, मोर, पटेपड़ी, गोह, चंदन गोह, बाज, कुरजां, नीलगाय, लोमड़ी, चील, गुगरराजा, टिटोली, सोन, तिलोर, सियार सहित सैकड़ों पशु पक्षी विचरण करते हैं। लेकिन पर्यावरण नष्ट होने पर पशु-पक्षियों की संख्या में निरंतर कमी आ रही है। विशेषज्ञों के अनुसार कई तरह के पंछी अब गोरण-गोचर में नजर भी नहीं आते हैं।

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जिले की सबसे बड़ी ओरण
चौहटन तहसील की ढोक पंचायत में 18 हजार 936.06 बीघा ओरण है। यह जिले की सबसे बड़ी ओरण है। करीब दस ग्राम पंचायतें इस ओरण की सीमा में लगती हैं। लाखों पेड़ और फोग वनस्पति इस ओरण की खासियत है।

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जिले में कहां कितनी ओरण

चौहटन - 23,405.11

सिवाना- 16,603.05

गुड़ामालानी- 7,436.59
सिणधरी- 5,871.08

सेड़वा- 5,556.15
बायतु- 8,534.15

पचपदरा- 17,417.8
बाड़मेर- 18,981.19

(भूमि बीघा में)


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