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बाड़मेर

सनावड़ा में गेर मेले का आयोजन, उमड़े हजारों दर्शक

सनावड़ा में गेर मेले का आयोजन, उमड़े हजारों दर्शक बाड़मेर। शहर से 35 किलोमीटर सनाड़वा गांव। होली के दूसरे दिन धुलंडी पर लगता है। देखने के लिए हजारों लोग उमड़ते हैं। यह मेला देखने के लिए आस-पास के गांवों से महिलाएं, बच्चे, युवा व बुजुर्ग कई किलोमीटर पैदल चल कर आते हैं। यहां पर ढोल व थाली की ताल पर जब गेेरिए आंगी-बांगी, सर पर कलंगी लगा साफा, पांवों में घुंघरू और हाथों में डांडिया लिए मैदान में उतरते हैं तो हर कोई दांतों तले अंगुली दबा लेता है।

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सनावड़ा में गेर मेले का आयोजन, उमड़े हजारों दर्शक

बाड़मेर। शहर से 35 किलोमीटर सनाड़वा गांव। होली के दूसरे दिन धुलंडी पर लगता है। देखने के लिए हजारों लोग उमड़ते हैं। यह मेला देखने के लिए आस-पास के गांवों से महिलाएं, बच्चे, युवा व बुजुर्ग कई किलोमीटर पैदल चल कर आते हैं। यहां पर ढोल व थाली की ताल पर जब गेेरिए आंगी-बांगी, सर पर कलंगी लगा साफा, पांवों में घुंघरू और हाथों में डांडिया लिए मैदान में उतरते हैं तो हर कोई दांतों तले अंगुली दबा लेता है।
सनावड़ा का गेर मेला विश्व प्रसिद्ध
सनावड़ा का गेर मेला विश्वप्रसिद्ध है। यहां पर 182 बरसों से गेर खेली जा रही है। यहां की गेर ने 1982 में एशियाड खेलों के उद्घाटन सत्र में प्रदर्शन दिखाया था। इससे इस गेर को प्रसिद्ध मिली।
घंटों तक चलता है गेर नृत्य
गेर नृत्य घंटों तक लगातार चलता है। बच्चे, युवा व बुजुर्ग बिना थके लगातार गेर खेलते रहते हैं। जो गेर देखने के लिए बैठ जाता है वह अपनी नजर गेर मैदान से ही नहीं हटा पाता है।
अब बेटियां भी आ रहीं आगे
गेर मेले में हर सालों से गेरिए रंग जमाते आए हैं, लेकिन अब गेर नृत्य में बेटियां भी अपना हुनर दिखा रही हैं। इस बार यहां 15 से 20 बेटियों ने घंटों तक गेर नृत्य किया। बेटियां सर पर साफा पहने आंगी-बांगी के साथ मैदान में उतरती हैं तो घंटों तक गेर नृत्य करती हैं। इससे मेले में चार-चांद लग जाते हैं। इस दौरान दर्शक भी काफी रहते हैं।
प्रशासन नहीं दिखा रहा रुचि
बाड़मेर के सनावड़ा में वर्षों से आयोजित गेर मेले में प्रशासन रुचि नहीं दिखा रहा है। मेले में आने वाले बच्चे, महिलाओं, युवाओं व बुजुर्गों को घंटों तक खड़ा रहना पड़ता है। यहां स्टेडियम बन जाए तो बैठने की व्यवस्था हो जाए। -नरेंद्र चौधरी, सनावड़ा
हर साल मम्मी-पापा मुझे गेर मेला दिखाने ले आते है। जब से यह मेला देखना शुरू किया है, तब से यही इच्छा थी कि मैं भी ऐसे रंगीन कपड़े पहन कर मैदान में नृत्य करूं। अब पापा ने आंगी दिला दी है। अब मैं भी घंटों तक अभ्यास करती हूं और मेले में प्रदर्शन करती हूं। -रवीनाकुमारी
गेर नृत्य हमारी परपंरा है। मैं वर्षों से मेला देखती आई हूं। अब विद्यालय में भी वार्षिकोत्सव में गेर का आयोजन होता है। घर पर पापा व विद्यालय में गुरुजन सिखाते हैं। आज गेर मैदान में खेलना अच्छा लगा। -मनोरमा कड़वासरा
गेर मेले का हम पिछले दो शताब्दी से आयोजन करते आए है। इसकी पोशाक आंगी व बांगी होती है। जिसका वजन 18 किलो के करीब होता है। इस नृत्य को तीन हिस्सों में खेला जाता है। तीसरा हिस्सा आत्मरक्षा का संदेश देता है। यहां की गेर ने संपूर्ण भारत में प्रदर्शन कर सबका दिल जीता है।-खींयाराम, व्यवस्थापक,गेर मेला