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बाड़मेर में प्रज्ज्वलित हुई थी जौहर की ज्वाला…तपा गढ़ सिवाना, ढाई दमका जैसाणा।

- सिवाना और जैसलमेर में भी हुआ था जौहर- वीरांगनाओं ने प्रज्ज्वलित की जौहर की ज्वाला- अलाउद्दीन खिलजी ने छल से जीता था किला  

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jaislmer fort

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वीरांगनाओं की गौरवगाथा से भरा पड़ा है मारवाड़ का इतिहास। खिलजी से लेकर अकबर ने खाई थी यहां मात। यह है इतिहास....

जैसलमेर/बालोतरा। राजस्थान के रणबांकुरों के साथ ही यहां की वीरांगनाओं की गौरवगाथा से भी इतिहास भरा हुआ है। केसरिया बांध यहां के वीर रण क्षेत्र में वीरता दिखाते हुए शहीद हुए तो वीरांगनाएं जौहर की ज्वाला में कूद पड़ी। जौहर का साक्षी सिवाना और जैसलमेर का किला भी रहा है। गढ़ सिवाना में दो और जैसलमेर के ढाई साके (जौहर) इतिहास में उल्लेखित हैं।

प्रथम जौहर खिलजी और दूसरा अकबर के समय
सिवाना गढ़ पर 1308 में अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण किया और इतिहासकार मानते हैं कि लंबे समय तक गढ़ के घेरा डालकर बैठे रहे अलाउद्दीन से यहां के परमार शासक ने डटकर मुकाबला किया। खिलजी ने सिवाना को जीतकर इसका नाम खैराबाद कर दिया था। उस समय पहला जौहर हुआ। खिलजी के सेनापति कमालुद्दीन ने यहां शासक सातनदेव के काल में किले को घेर लिया। इतिहासकार मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक में तो उल्लेख है कि 1310 में खिलजी स्वयं यहां आया था। उसने करीब एक साल के घेरे बाद सिवाना गढ़ जीता।

कल्ला की महारानी, बहन और क्षत्राणियों ने किया जौहर
ईस्वी सन् 1600 के आसपास अकबर की सेना ने सिवाना दुर्ग पर आक्रमण किया। वीरता से लड़ते हुए शासक राव कल्ला राठौड़ शहीद हुए। इस पर रानियों ने किले में जौहर किया। अकबर की सेना ने मोटा राजा उदयसिंह को किला सुपुर्द किया। इन्होंने इस पर शासन किया। राव कल्ला राठौड़ सिवाना के अंतिम शासक थे। इसके बाद इस दुर्ग पर जोधपुर महाराजा का आधिपत्य रहा। अकबर के काल में इस दुर्ग में राव कल्ला की महारानी और उनकी बहन के जौहर के प्रमाण इतिहासकार दे रहे हैं।

छल से जीता था खिलजी
अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने जालोर और सिवाना पर आक्रमण कर दोनों को जीता था। क्षत्राणियों ने जौहर किया। यहां के योद्धा वीरता से लड़े और शहीद हो गए। गढ़ सिवाना मारवाड़ में वीरता का बड़ा प्रमाण है। खिलजी ने यहां कूटनीति से जीत दर्ज की थी। उसको लंबे समय तक किले के बाहर घेरा डालना पड़ा और फिर छल से कुछ लोगों को अपने साथ कर जीता था।- दीपक जोशी, व्याख्याता इतिहास एवं शोधार्थी सिवाना दुर्ग पर अल्लाउद्दीन खिलजी व अकबर की सेना ने आक्रमण किया था। इनमें सिवाना शासकों के प्राणोत्सर्ग पर दुर्ग में रानियों ने जौहर किया था।- जीवराज वर्मा, इतिहासकार सिवाना


इतिहास में दर्ज जैसलमेर के ढाई साके
कलात्मक सुन्दरता व गौरवपूर्ण संस्कृति के साक्षी जैसलमेर के इतिहास में ढाई साकों का उल्लेख है। जैसलमेर की स्थापना मध्यकाल के शुरूआत में 1178 ई. में यदुवंशी भाटी के वंशज रावल जैसल ने की थी। उनके वंशजों ने वंश क्रम के अनुसार लगातार 770 वर्ष सतत् शासन किया। जानकारों के मुताबिक प्रथम साका अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय हुआ था। तब भाटी शासक रावल मूलराज, कुंवर रतनसी सहित बड़ी संख्या में वीर योद्धाओं ने असिधारा तीर्थ में स्नान किया और महिलाओं ने जौहर का अनुष्ठान किया। दूसरा साका फिरोज शाह तुगलक के शासन के शुरूआती वर्षों में होना बताया जाता है। जानकारों के अनुसार रावल दूदा, त्रिलोकसी व अन्य भाटी सरदारों और योद्धाओं ने दुश्मन की सेना का पराक्रम के साथ सामना किया, लेकिन युद्ध में वीर गति प्राप्त की। इस दौरान दुर्ग में वीरांगनाओं ने जौहर किया। इतिहासकारों के अनुसार तृतीय साके को आधा साका ही माना जाता है। 1550 ईस्वी में राव लूणकरण के शासन काल में कंधार के शासक अमीर अली का आक्रमण हुआ था। तीसरे साके को अद्र्ध साका इसलिए माना जाता है कि इस दौरान वीरों ने केसरिया बाना पहनकर युद्ध तो किया लेकिन जौहर नहीं हुआ। जैसलमेर में ढाई साके राजस्थान के जौहर व साके में उल्लेखित हैं।