
Success of life is to keep parents happy
बाड़मेर. सूत्र साधना भवन में धर्मसभा में आचार्य कवीन्द्रसागरसूरीश्वर ने कहा कि माता-पिता को तीर्थ मानकर उनकी पूजा, भक्ति और प्रसन्न रखने में ही मानव जीवन की सफलता का रहस्य छुपा है।
माता-पिता की पूजा सदैव करना हमारा फर्ज है वे हमारे जीवनदाता है। माता को 9-9 महीने तक जीव को उदर में धारण करने में तीव्र वेदना, तकलीफ होती है, पर सभी वेदना को हंसते हुए बालक का संरक्षण करती है। पिता अपने बच्चों की अपेक्षाएं, महत्वाकांक्षाओं को पूर्ण करने के लिए दस या बारह घंटे मेहनत मजदूरी करता है।
सभी कष्टों को तृणवत् मानकर उनको खुश रखने का प्रयास करता है। नीतिशास्त्र में कहा कि हम अपनी चमड़ी की माला बनाकर माता-पिता को पहना दे तो भी आप उनके ऋण से मुक्त नहीं हो सकते हैं।
संस्कार मजबूत करने होंगे
आत्मा की शुद्धि का और महापुरुषों का जीवन चरित्र आत्म रमणता का कार्य करता है। जब हमारे संस्कार मजबूत होंगे तब पूरे परिवार में व्याप्त हो जाएंगे। भक्ति में वो शक्ति है जो व्यक्ति को मुक्ति के मंजिल तक पहुंचा सकती है। स्वार्थ की दुनिया में न तो कोई अपना था, न कोई अपना है और न कोई कभी अपना होगा।
जैन न्याति नोहरा में चातुर्मासिक प्रवचनमाला के दौरान मंगलवार को साध्वी सुरंजनाश्री ने उक्त उद्गार व्यक्त किए।
खरतरगच्छ चातुर्मास समिति, बाड़मेर के मीडिया प्रभारी चन्द्रप्रकाश छाजेड़ ने बताया कि बुधवार सुबह 11:30 बजे सौभाग्य तप की महिलाओं की ओर से तप की पूर्णाहुति निमित्त पावव-पद्मावती महापूजन का आयोजन होगा।
साधना व समता का है साधु जीवन
मुनि मनितप्रभसागर ने नाहटा ग्राउण्ड में धर्मसभा में कहा कि साधु जीवन साधना और समता का है। एक साधु जब दीक्षा लेता है तब ऐसा अभिग्रह लेता है कि साधना काल में चाहे कितने भी उपसर्ग आए घुटने नहीं टेकूंगा।
घुटने न टेकना उसके अहंकार का परिचायक नहीं, अपनी आत्मा को निर्मल एवं विशुद्ध बनाने का संकल्प है। साधु जीवन का अर्थ सुविधायुक्त जीवन शैली, बाह्य वस्तुओं के प्रति, आसक्ति पूर्ण जीवन शैली नहीं है, साधु जीवन का अर्थ है प्रतिकूलता में जानबूझकर जाना, प्रतिकूलता से पाणिग्रहण कर अष्टसिद्धि और नवनिधि प्राप्त करना।

Published on:
22 Aug 2018 10:40 am
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