
बाड़मेर के दिल में धड़कता है आज भी थार महोत्सव
थांनै उडीके बाड़मेर
बाड़मेर पत्रिका.
मैं थार महोत्सव हूं... मेरी यात्रा की शुरूआत होती थी मेरी शोभायात्रा से। सुबह सात बजे हाइस्कूल से यह कारवां शुरू होता। सजे-धजे ऊंट और उस पर सवार बीएसएफ के रौबिले जवानों के साथ ही आम आदमी जिनकी कद काठी ऐसी कि देखते ही लगे बांका बाड़मेरी। इनके पीछे नाचते-गाते भवाई, चकरी, कच्ची घोड़ी और ढोल थाली पर कलाकार। जिनकी हर अदा शोभायात्रा में आगे बढ़ते हुए ऐसी बिखरती कि बाजार में कदम ठिठककर रह जाते। इनके साथ ही सनावड़ा-कनाना-जसोल और अन्यत्र से आए गैरियों की गैर में उठते कदम...। ढोल की थाप और थाली की टंकार के साथ ये घुंघरूओं की लय ताल मिलाते ये कदम जब जमीन पर पड़ते है तो मजाल है पास खड़े व्यक्ति के पांव में कंपन न आए और वो भी मन ही मन न नाचे...। मन नचाने वाले इस दृश्य के बाद पीछे चलने वाले ऊंट-गाड़ों पर सवार मांगणिहार कलाकार की स्वर लहरिया...केसरिया बालम आवोनी पधारो म्हारे देस....आहा। कानों में मिश्री घोलते थार के इन सुरों के साथ जब सुबह-सुबह धोधेखां के अलगोजे की आवाज मिश्रीत होती तो कदम जहां थे वहीं रुक जाते। वक्त ठहरकर कहता..सुन लो ये है अलगोजे का जादूगर और शोभायात्रा का सारी की सारी महफिल लूटता धोधेखां इस आयोजन को चार चांद लगाता नजर आता। इनके पीछे थार सुंदरी और थार श्री बनने की इच्छा लेकर पूरे बाड़मेरी वेष में लकदक युवक युवतियों के चलते की ठसक और अंदाज देखकर तो हर कोई मोहित होकर अंदाजा लगाता कि इस बार तो यह बाजी मार जाएगा। कमाल के तैयार होने वाले इन युवकों के दिलों से पूछिए कि उनके लिए अपने ही जिले का थारश्री बनने का कितना बड़ा सपना है जो अब पूरा नहीं हो रहा है और वे अन्य जिलों में जाकर खड़े होते है तो सोचते है, यह हमारा बाड़मेर नहीं है। इसी शोभायात्रा में शामिल होने वाले कच्ची घोड़ी के कलाकार जगदीश पंचारियां का नृत्य मोहित करता तो थार की लता और भवाई का जादूगर स्वरूप पंवार जब अपनी अदाएं बिखेरेता तो लोग देखते हाकबाक रह जाते है कि पुरुष कलाकार की बलखाती यह कमर वाकई कमाल है। इस आयोजन में कितने ही कलाकारों का एक पूरा जत्था पूरे बाड़मेर को समेटे हुए जब बाजार में आता तो साथ चलने वाले तमाम प्रशासनिक अधिकारी, जनप्रतिनिधि, बीएसएफ, एयरफोसज़् और अन्य विभागीय अधिकारी और आयोजन में शरीक होने वाले कला, साहित्य और संस्कृति के संवाहकों के कदमों की चाल दिखाती कि आज वे इसलिए इतने उत्साहित है कि मेरे साथ वो बाड़मेर को लेकर चल रहे है। क्या हुआ,यहां अंग्रेज नजर नहीं आते थे लेकिन मेरे अपने बाड़मेर के लोगों के भीतर जो मैं(बाड़मेर) धड़कता उस पर ऐसे लाखों अंग्रेज न्यौछावर कर दूं। बस,यहीं से अपना सवाल करता हूं...क्या बाड़मेर के सैकड़ों कलाकार मायने नहीं रखते। क्या लोक संगीत और साहित्य की यह झलक देखने का मन नहीं होता? क्या तीन दिन तक मुझमें थिरकते बाड़मेर को जिंदा नहीं किया जा सकता? यही तो अवसर था, जिसमें कलाकारों का उत्साह और उनके मान सम्मान को देखकर नए कलाकार उत्साहित होते थे कि हम भी ऐसा करेंगे? यह लोक संस्कृति तभी बची रहेगी जब नई पीढ़ी जुड़ेगी। सच बता दूं, एक मैं ही था जो इस हर साल नई पीढ़ी को प्रेरित करता था कि आओ, जीओ मुझे...मैं तुम्हें ले जाऊंगा किसी टीवी के बड़े मंच, पद्मश्री तक के पुरस्कार और लाखों लोगों की दाद की गडगड़़ाहट तक...तुम्हारे अंदर के कलाकार का सम्मान हूं मंै..बस, इस बाड़मेर को जो समझदार समझेगा...वही तो मुझे शुरू करने की बात कहेगा।
Published on:
24 Feb 2022 01:09 pm

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