
The impenetrable is the western border The enemy remembers chhachhro
बाड़मेर.देश की पश्चिमी सीमा। बाड़मेर-जैसलमेर की सरहद। 1971 का युद्ध। दुश्मन ने सोचा कि धोरों को पार कर वह नापाक कदम आगे बढ़ा देगा। अपनी टैंक रेजीमेंट के दंभ में आगे बढ़ गया। जैसलमेर ? से प्रवेश करने का इरादा और सुबह तक जोधपुर पहुंचने का दुस्साहस। उसे क्या मालूम था कि जैसलमेर के लोंगेवाला में महज 120 सैनिकों की टुकड़ी उसकी टैंक रेजीमेंट को यहां के धोरों में दफन कर देगी। बेफिक्र दुश्मन यह भी मान बैठा कि बाड़मेर के बाखासर के रास्ते तो भारत आगे ही नहीं बढ़ पाएगा। लेकिन भारतीय सेना के अदम्य साहस, वीरता और थार के इस रेगिस्तान की रणनीति पर भरोसे ने उसके दांत एेसे खट्टे किए कि 46 साल बाद भी वह धोरों की इस धरती की तरफ आने से धूजता है। अभेद्य पश्चिमी सीमा से आगे बढ़े जवानों ने छाछरो फतह का इतिहास लिख दिया पाकिस्तान का न केवल इलाका फतह हुआ उसके यहां से 66 हजार लोग वतन छोड़ भारत आ बसे।
1971 में छाछरो किया था फतह- पश्चिमी सीमा अभेद्य रही है। 1971 के युद्ध में थार के इन धोरों को राष्ट्र रक्षा के लिए चुना गया तो यहां सवाई भवानीसिंह की कमान में सेना आगे बढ़ी। सेना ने बाखासर रण से रास्ता लेते हुए छाछरो तक को फतह कर दिया और कराची पहुंचने से पहले रोक दिया था। पाकिस्तान की यह बड़ी हार थी और इसके बाद इस सीमा से पाकिस्तान ने आगे बढऩे की कभी हिमाकत नहीं की है। बाखासर के बलवंतसिंह, किसान चतरसिंह और सेना के जवानों ने अदम्य साहस और यहां के नागरिकों के पूरे साथ ने पाकिस्तान को बाड़मेर की सरहद के निकट भी नहीं आने दिया।
1935 में बना, उत्तरलाई 1971 में आया काम- 1935 में ब्रिटिश सरकार ने उत्तरलाई में अपने विमान उतारने को हेलीपेड बनाया था। 1971 में युद्ध छिड़ा तो थलसेना की मदद को उत्तरलाई से मदद शुरू हुई। यहां पर विंग कमाण्डर आप्टे के साथ जाबांज वायुसैनिकों ने हमला बोला। आप्टे शहीद हुए। उन्हें मरणोपरांत वीरचक्र दिया गया। उत्तरलाई की मारक क्षमता ने पाकिस्तान के दांत खट्टे कर दिए।
यह है पश्चिमी सीमा की ताकत
एयर स्टेशन उत्तरलाई- अत्याधुनिक हवाई जहाजों की पूरी कमान यहां है। सुरक्षा दीवार के पीछे ही दो सौ किलोमीटर पर है साथी जोधपुर। राडार क्षमता, हेलीकाफ्टर, अत्याधुनिक मारक क्षमता के हवाई जहाज और हथियार वाले इस एयर स्टेशन का हाल ही में रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण ने भी दौरा किया। उन्होंने कहा था कि इस वायुसेना स्टेशन पर पूरा ध्यान दिया जाएगा।
बीएसएफ की पल-पल नजर- बीएसएफ पश्चिमी सीमा की बड़ी ताकत है। रेत के धोरों में दुश्मन की हर नापाक नजर पर ध्यान रख रही बीएसएफ के यहां रहते परिंदा भी पर नहीं मार सकता है। यहां पर अंतरराष्ट्रीय रेलवे स्टेशन मुनाबाव स्थित है और बीएसएफ ने सुरक्षा की जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है। घुसपैठ की कई कोशिशों को नाकाम कर चुकी बीएसएफ ने यहां पाकिस्तान के तस्करी के नेटवर्क को ध्वस्त किया है।
थलसेना है थार का बड़ा भरोसा- थलसेना की दक्षिणी कमान थार की सबसे बड़ी ताकत है। 1971 के युद्ध में भी थल सेना ने यहां आगे बढ़ते हुए छाछरो तक पाकिस्तान केा पीछे धकेल दिया था। अब यहां पर दक्षिणी कमान बड़ा युद्धाभ्यास हमेशा विजयी कर रही है। सेनाध्यध्क्ष बिपिन रावत इसके साक्षी होंगे। बीते दिनों यहां गृहमंत्री, रक्षामंत्री और सेना के बड़े अधिकारियों ने भी सेना की ताकत को परखा है।
तैयार है हरवक्त थार
थानों को किया गया प्रशिक्षित-
- पश्चिमी सीमा को मजबूत करने की दिशा में पुलिस के सीमावर्ती थानों के नेटवर्क को मजबूत किया गया है। यहां अत्याधुनिक हथियारों का प्रशिक्षण देते हुए इनका तालमेल बीएसएफ के साथ हुआ है।
- वायुसेना की ताकत को रक्षामंत्री ने परखा है और बाड़मेर सहित जैसलमेर पहुंचकर यहां की ताकत को मजबूत बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है
- युद्धाभ्यास हमेशा विजयी से सेना की दक्षिणी कमान के साथ वायुसेना से भी जुड़ी है। जिस तरह 1971 में सेना के साथ वायुसेना का सहयोग रहा था वैसा ही प्रशिक्षण इस बार प्राप्त किया गया है
यह भी ध्यान रहे
गौरिल्लों की फिर जरूरत
पश्चिमी सीमा पर एसएसबी का बड़ा नेटवर्क था जो सरहदी गांवों में फैला था। इसके लिए स्वयंसेवक गौरिल्ले तैनात थे। करीब एक दशक पहले इनको यहां से हटा दिया गया। इस नेटवर्क को पुन: यहां खड़ा किया जाता है तो यह सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
बंद चौकियां कब खुलेगी
- सीआईडी सीबी की 22 चौकियां पश्चिमी सीमा पर तैनात थी। इन चौकियों को भी 2007 में बंद कर दी गई। इन चौकियों के जरिए भी अवांछित गतिविधियों पर पूरी नजर रहती थी। खुफिया एजेंसी के इस नेटवर्क को भी पुन: प्रारंभ करने की मांग कई बार उठी लेकिन अभी तक इस पर गौर नहीं हुआ है।
- बॉर्डर क्षेत्र में बढ़ती आबादी पर नजर
बॉर्डर पर आबादी लगातार बढ़ रही है। साथ ही यहां निर्माण कार्य भी अंधाधुंध जारी है। इस स्थिति में यहां पर खुफिया नेटवर्क को और भी सुदृढ़ करने की दरकार है। साथ ही बीएसएफ, सेना और अन्य एजेंसियों का ग्रामीण स्तर तक जुड़ाव भी बेहद जरूरी हो गया है। पुराना तस्करी का नेटवर्क कई बार सिर उठाता रहा है इस पर भी नजर की दरकार है।
विस्थापित न बन जाए समस्या
पाकिस्तान छोड़कर थार एक्सप्रेस के जरिए विस्थापित आ रहे हैं। ये जोधपुर व बाड़मेर में बसने लगे है। स्थाईवास पर आ रहे इन विस्थापितों की संख्या बढऩे से भी समस्या बढ़ रही है। इन लोगों की समस्याओं का समाधान होने के साथ ही सुरक्षा की दृष्टि से इस तरफ ध्यान देने की जरूरत है।
Published on:
22 Dec 2017 12:13 pm
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