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1971 के युद्ध की शौर्यगाथा की साझी रहे है थार के ये योद्धा , जानिए पूरी खबर

16 दिसंबर 1971 -3 दिसंबर से 17 दिसंबर तक चला था युद्ध -4000 वर्ग किलोमीटर के करीब कब्जा कर लिया था भारत ने -60333 लोगों ने छोड़ा था पाक

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warriors of Thar, Partner of the 1971 war

This warriors of Thar is in the Partner of the 1971 war

16 दिसंबर 1971

फेक्ट फाईल

- 3 दिसंबर से 17 दिसंबर तक चला था युद्ध

- 4000 वर्ग किलोमीटर के करीब कब्जा कर लिया था भारत ने

- 60333 लोगों ने छोड़ा था पाकिस्तान

बाड़मेर पत्रिका.
शौर्य की गाथाओं से भरी पड़ी 1971 की फतह में थार के रेगिस्तान ने अदम्य साहस और वीरता की एेसी कहानियां जुडी है जो अद्वितीय है। यहां के एक डाकू ने देशभक्ति का वो परिचय दिया कि भारत सरकार ने उसके सारे पुलिस केस माफ कर दो हथियारों का लाइसेंस दे दिया और बलवसिंह बाखासर हीरो बन गया। ढोक के किसान छतरसिंह ने भारतीय सेना का नेतृत्व करते हुए बमबारी के बीच में छाछरो फतह में वीरता का एेसा परिचय दिया कि इस किसान को राष्ट्रपति वी वी गिरी ने शौर्य चक्र नवाजा, जो एक सामान्य नागरिक के लिए बहुत बड़ा सम्मान है। उधर यहीं के जाए जन्मे मेजर हणूतसिंह ने पाकिस्तान की 38 टैंकों की पूरी रेजिमेंट को ही नस्तेनाबूद कर दिया।

बम बरसते रहे और छतरसिंह ऊंटों का कारवां लेकर बढ़ते रहे
सीमावर्ती ढोक ग्राम पंचायत के सामान्य किसान और सरपंच छतरसिंह। गांव में ही थे और भारत पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ गया। 197 रेजिमेंट यहां आ पहुंची। रेजिमेंट के नायक ने छतरसिंह से संपर्क कर कहा कि यहां फौज तो आगे बढ़ेगी लेकिन उसके साथ में राशन की आपूर्ति कैेसे होगी? छतरसिंह ने अपने क्षेत्र के 24 ऊंट लिए और सेना के साथ हो गए। अब सेना युद्ध में आगे बढऩे लगी। पाकिस्तान ने बमबारी शुरू कर दी। इस बीच कोई आगे बढऩे को तैयार नहीं था। छतरसिंह ने एक के पीछे एक चौबीस ऊंटों को बांध दिया और राशन डालकर अकेले ही इनकेा लेकर निकल पड़े। न केवल राशन पहुंचाया वे टुकड़ी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लडऩे लगे। भारत ने 17 दिसंबर तक ढोक से छोर तक का इलाका कब्जे में ले लिया। उनके अदम्य साहस और वीरता के आगे भारतीय सेना की टुकड़ी गर्व से सीना ताने सेल्यूट किए हुए खड़ी थी। भारतीय सेना ने इस किसान योद्धा के सम्मान में शौर्य चक्र प्रदान किया। देश के राष्ट्रपति वी वी गिरी ने जब छरतसिंह के सीने पर यह मेडल लगाया तो उनका सीना में भी गर्व से फूल गया कि इस तरह के नागरिक है जो देश में है।

डाकू बलवंतसिंह बन गए सेना के हीरो
ब्रिगेडियर सवाई भवानीसिंह जयपुर को 1971 के युद्ध में बाड़मेर कमान थी। वे यहां गुजरात से सटे बाखासर इलाके में पहुुंचे। रण के इस क्षेत्र में रास्ता ढूंढना और आगे बढऩा मुश्किल था। उस वक्त बाखासर में डाकू बलवंतसिंह का रौब था। वे यहां से पाकिस्तान के छाछरो तक आते-जाते रहते थे। पुलिस के उन पर कई केस थे। ब्रिगेडियर भवानीसिंह ने बलवंतसिंह को याद किया। फिर क्या था, बलवंतङ्क्षसह ने देश के लिए हथियार हाथ में ले लिया और भारतीय सेना के साथ रवाना हो गए। सामने टैंक रेजिमेंट थी। भवानीसिंह और बलवंतसिंह ने चतुराई करते हुए अपनी जीप जोंगा के साइलेंंसर खोल दिया। इनकी आवाज एेसी हो गई जैसे सामने भी टैंक रेजिमेंट ही हों। इससे पाक सेना ठिठक गई। मौके की तलाश में रहे बलवंतसिंह ने अदम्य साहस दिखाते हुए भवानीसिंह के साथ रहते हुए दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए। पाकिस्तान के छाछरो तक सेना पहुंच गई। युद्ध समाप्ति बाद भवानीसिंह को महवीर चक्र मिला तो बलवंतङ्क्षसह हीरो बन गए। उनके सारे पुलिस केस वापिस ले लिए गए। दो हथियारों का लाइसेंस भी दिया गया। भारतीय सेना अपने इस रोबिनहुड हीरो को याद करते हुए गर्व करती है। थार में यह अदम्य साहस की कहानी 1971 मंें लिखी है।

उधर हणूतसिंह ने 38 टैंकों को कर दिया रेगिस्तान में दफन
जिले के जसोल गांव के हणूतसिंह ने तो पूना रेजिमेंट का गर्व 1971 के युद्ध में एेसा ऊंचा किया कि उनको फक्र ए हिन्द पाकिस्तान को कहना पड़ा और भारतीय सेना को आज भी उन पर इतना गर्व है कि मरणोपरांत उनकी ढाणी में एक टैंकर रखा गया है जो पूना रेजिमेंट के इस अद्वितीय योद्धा की वीरता की कहानी कहती है। हणूतसिंह के सामने पाकिस्तान के 38 टैंक थे। पाकिस्तान की फौज को यह गुमान था कि इन टैंक के बूते वे भारत के छक्के छुड़ा देंगे लेकिन हणूतङ्क्षसह वीरता के साथ आगे बढ़े और एक-एक कर अचूक निशाने व दिलेरी के साथ पाकिस्तान की पूरी रेजिमेंट को ही नश्तेनाबूद कर दिया। पाकिस्तान केा जब यह खबर लगी की पूरी टैंक रेजिमेंट खत्म हो गई तो पूरी फौज इलाका छोड़ पीछे हो गई। पूना रेजिमेंट के गौरव हणूतसिंह सन्यासी जीवन जीत रहे। उन्होंने शादी नहीं की थी। सेना में सेवा के बाद वे देहरादून में रहे और दो साल पहले उनके निधन बाद अब उनकी ढाणी जसोल में पूना रेजिमेंट ने टैंक लाया है। उनकी गौरव गाथा कहना यह टैंक अब यहां रहेगा।

फ्लाइट लेफ्टिनेंट पी वी आप्टे का अमर बलिदान
1971 के युद्ध में लोंगेवाला की तरफ पाकिस्तान की सेना बढ़ रही थी। मेजर कुलदीपसिंह चांदमारी के नेतृत्व में भारतीय सेना के जवान मुकाबला कर रहे थे और उन्हें हवाई मदद की दरकार थी। इसके लिए बाड़मेर के उत्तरलाई वायुसेना बेस को 3 दिसंबवर 1971 को आदेश मिला। मिग 21, मारूत हिन्दुस्तान फाईटर 24 और हंटर फाईटर वायुसेना ने तैयार किए। पाकिस्तान ने बमबारी के जवाब में उत्तरलाई में तैनात विंग कमांडर वीके मुर्थेई के नेतृत्व में जवाबी हमले की तैयारी की। भारतीय वायुसेना के जहाज बेड़े ने हवाई हमला बोला तो लोंगेवाला की तरफ बढ़ रही पाकिस्तान सेना महज दो सौ मीटर की दूरी से पलटी और देखते ही देखते पाकिस्तान के सैनिकों की लाशें पूरे बोर्डर पर बिछ गई। बचे सैनिकों को वाहन यहीं छोड़कर उल्टे कदम भागना पड़ा। इस कार्यवाही में शहीद हुए फ्लाइट लेफ्टिनेंट पी वी आप्टे को मरणोपरांत वीर चक्र मरणोपरांत प्रदन किया गया। इसके अलावा एयरक्राफ्ट प्रतापसिंह शेरमा भी शहीद हुए। इस पराक्रम में शामिल रहे विंग कमांडर केसी अग्रवाल, स्वाड्रन लीडर के के बख्शी, स्कवाड्रन लीडर आईएस बिन्द्रा, फ्लाइट लेफ्टिनेंट एसबी शाह, फ्लाइट लेफ्टिनेंट ए के दत्ता, फ्लाइट लेफ्टिनेंट एन कुकरेजा की वीरता को भी वीरचक्र मिला।

शादी होते ही छोड़ गए पत्नी को 36 माह बाद लौटे
बाड़मेर के ही केप्टन हीरसिंह भाटी। उड़ी सेक्टर में 1971 में कार्यरत थे। उनकी शादी के कुछ समय बाद ही ड्युटी पर चले गए। 1971 का युद्ध छिड़ गया। झेलम नदी के पास तैनात हीरसिंह भाटी उस समय प्लाटून कमांडर थे। रेजिमेंट को युद्ध लडऩे का अवसर मिला तो हीरसिंह बताते हुए है कि उनका सीना चौड़ा हो गया। वे देश के लिए युद्ध लडऩे के लिए सबसे आगे हो गए। इसके बाद प्लाटून ने पाकिस्तानी सेना से मुकाबला दिया। जवाब में उनकी टुकड़ी पर कुछ दिन बाद हमला बोल दिया गया और इसमें सैनिक शहीद हो गए। सेना ने तय किया कि इसका बदला लिया जाएगा। इस पर एक साल के लिए उनको इंतजार करना पड़ा। एक साल बाद हुई सर्जिकल स्ट्राइक में पाकिस्तान की टुकड़ी सेबदला लिया गया। इसके बाद रेजिमेंट के सामने प्रस्ताव आया कि दुबारा हमला होने व नागरिकों की सुरक्षा के लिए रहना पड़ेगा। यहां रहकर कौन अपनी छुट्टियांे को सरैण्डर करेगा। इस पर नवविवाहित हीरसिंह ने आगे आकर कहा कि वे तैयार है। 1971 के युद्ध लडऩे वाला यह जाबांज सैनिक 1974 में 36 माह बाद घर लौटा। सेना से लगाव रखने वाले वीर हीरसिंह ने अपनी बेटी की शादी भी एक फौजी से की। उनके दामाद उगमसिंह करगिल युद्ध में शहीद हो गए। हीरसिंह अब भी सैनिकों के लिए ही अपना जीवन जी रहे है।

1971 के बाड़मेर के युद्ध शहीदों के नाम

- मगाराम जाट गिड़ा बायतु
- स्वरूपसिंह परेऊ बायतु

- नारायणराम लेघा चीबी बायतु
- छगनाराम मेघवाल बालोतरा

- कुंभाराम सियाग, माधासर बायतु
- दुर्जनङ्क्षसह राठौड़, रेड़ाणा शिव

- विशनसिंह सोढ़ा, भूंकाथानसिंह सिणधरी
- दीपाराम सुथार, सणतरा बायतु

- नारायणराम चौधरी नौसर पनजी
- देवाराम बेनिवाल, बायतु पनजी

- बाघाराम लूखा, कोसरिया बायतु

1971 के युद्ध मैदान से मिला चौहटन को विधायक
एक तरफ भारतीय सेना सवाई भवानीसिंह के ब्रिगेड में छाछरो के भादास के गांव पहुंच गई और दूसरी तरफ पाकिस्तानी सेना। दोनों ओर से गोलियां और बमबारी चल रही थी। रेत के एक टीले पर हम बैठे हुए युद्ध को देख रहे थे। जाएं तो जाएं कहां? मरते और घायल होते सैनिक, कौन हिन्दुस्तानी कौन पाकिस्तानी कुछ पता नहीं। जो भी टीले तक पहुंचा पानी मांग रहा था या मरहम पट्टी। हमारे पास जो था मदद कर रहे थे। युद्ध के इस मैदान के बीच में हमारे परिवार को यह उम्मीद नहीं थी कि हम बचेंगे। बम गिरेगा तो मारे जाएंगे और सैनिक आ गए तो भी। युद्ध के इस मैदान से भारतीय सेना के जवान पहुंचे और बताया कि छाछरो फतह कर लिया है। भारत जाना चाहते है वे पहुंचे। हम लोगों ने अपने ऊंट-गधे लिए और वहां से रवाना हो गए। बरसतें गोले-बारूद के बीच जान बचाते हुए आगे बढ़े। दूसरे दिन चौहटन के शोभाला जेतमाल पहुंचे और यहां आकर शरण ली। युद्ध समाप्ति बाद जीवन का बड़ा संघर्ष सहन किया। इसके बाद यहां नौकरी की। फिर पाक विस्थापितों सहित यहां के लोगों के साथ संपर्क बना और जनप्रतिनिधि बन गया। इस मुल्क ने हमें इतना दिया है कि 1971 में आया एक शरणार्थी आज यहां की विधानसभा का सदस्य है। 1971 का युद्ध आज भी मेरे दिल में तरोताजा है।- तरूणराय कागा, विधायक चौहटन

फैशन के रैंम्प तक पहुंची है मीरां
पाकिस्तान के छोर इलाके में एक छोटी सी लड़की मीरां। आठ नौ साल उम्र रही होगी। युद्ध में परिवार घिरा तो परिवार के साथ रवाना हुई। सात दिन तक भटकते-भटकते और जान बचाते हुए बाड़मेर पहुंचे। यहां कहीं शरण नहीं मिली तो आखिर मे महाबार गांव आ गए। यहां आने के बाद उसकी शादी हो गई। परिवार के साथ रह रही इस महिला ने कशीदाकारी का काम शुरू किया। एक संस्थान के साथ जुड़ी मीरां ने पाकिस्तान से आई अपनी अन्य साथिनों को जोड़ा। करीब चार हजार महिलाएं अब यह कार्य कर रही है। मीरां के हुनर को इतनी कद्र मिली है कि बीते दिनों वह जयपुर में हुए फैशन शो में देश के बड़े फैशन डिजाइनर के साथ फैशन के रैम्प पर चली। वह कहती है कि रैम्प पर भी उसे 1971 के वो दिन याद आकर आंसू आ गए जब वह जान बचाते हुए धोरों को पार करते हुए यहां आई थी।

1965 से 1971 60333 लोगों ने छोड़ा पाकिस्तान

भारत पाकिस्तान के बंटवारे के वक्त 33 हजार लोग पाकिस्तान छोड़कर भारत आए थे। बंटवारे के बाद 1965 से 1971 का दौर ही एेसा रहा जिसमें सर्वाधिक लोग पाकिस्तान से यहां आकर बसे। दोनों युद्ध में 60333 लोग पाकिस्तान छोड़कर भारत आ गए। इसमें भी 1971 के युद्ध में आने वालों की संख्या 50 हजार से अधिक मानी जाती है। छाछरो तक पाकिस्तान भारतीय सेना के कब्जे में था और यहां बसे लोग पाकिस्तान के जुल्मों शितम से तंग थे। इन लोगों ने युद्ध में पाकिस्तान को अलविदा कह दिया। यहां आने के बाद इन शरणार्थियों केा भारत ने पूरी तवज्जो दी है और सभी को नागरिकता दे दी गई है। भारत के नागरिक बने ये लोग बाड़मेर शहर सहित पूरे बोर्डर क्षेत्र में बसे है और इनके रोटी-बेटी का रिश्ता आज भी है।

रिपोर्ट- रतन दव