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ईश्वर ने नहीं बनाया तो खुद ही बन गई मां,जानिए बाड़मेर की दो माओं के ममत्व की बेमिसाल कहानी

सीमावर्ती जिले में दो उदाहरण एेसे है जिन्हें ईश्वर ने तो मां नहीं बनाया लेकिन वे खुद ही मां बन गई। चौहटन की स्नेहलता और बालोतरा की लीलाबाई।

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Unmatched story of motherhood,wo mothers of Barmer

Unmatched story of motherhood Two mothers of Barmer

ओम माली@बाड़मेर.सीमावर्ती जिले में दो उदाहरण एेसे है जिन्हें ईश्वर ने तो मां नहीं बनाया लेकिन वे खुद ही मां बन गई। चौहटन की स्नेहलता और बालोतरा की लीलाबाई। स्नेहलता को संतान नहीं हुई तो उन्होंने अनाथ आश्रम खोलकर एेसे बच्चों को अपना लिया है जिनमें से अधिकांश वे है जिन्हें नाताप्रथा के चलते मां छोड़कर चली गई है और किन्नर लीलाबाई अनाथ और गरीब बेटियों की शादी करवाने के साथ गरीब बच्चों को पालकर यह सुख ले रही है।

चौहटन कस्बे की स्नेहलता वासु ने 1990 में शादी की। उनके संतान नहीं हुई। मां बनने को तरस रही स्नेहलता ने 2007 में अपने घर में अनाथ आश्रम खोल दिया। उन्होंने एेसे बच्चों को साथ रखना शुरू किया जिनको नाताप्रथा के चलते मां ने दूसरी शादी रचा ली और पिता का निधन हो चुका था। इसके अलावा जिनके मां-बाप नहीं है। अब उनके पास 15 एेसे बच्चे है। स्नेहलता इन बच्चों के लिए ग्रामीणों के सहयोग लेती है और इनका लालन-पालन कर मातृत्व का सुख प्राप्त कर रही है। वह कहती है कि ये मां को तरस रहे थे और मैं संतान को...। 6 से 14 साल के इन बच्चों को पढ़ाती है और इनमें से अधिकांश होनहार है। उनके पास एेसा भी बच्चे है जिन्हें जन्म के तुरंत बाद मां छोड़ गई और वे उसे लाकर मां की तरह पाल रही है।

लीलाबाई है बालोतरा की बड़ी मां

एक किन्नर जिसके जीवन में मां बनने अकल्पनीय सपना है लेकिन बालोतरा की लीलाबाई तो बालोतरा की बड़ी मां है। लीलाबाई यहां अनाथ और गरीब बच्चों को पालती है। यजमानों से मिलने वाली रुपयों का लीलाबाई करीब दो दशक से एेसे ही उपयोग कर रही है। किसी गरीब की शादी हों और उसके लिए प्रबंध नहीं हो रहा हों तो लीलाबाई वहां पहुंचकर यथायोग्य मदद करती है। सौ से अधिक शादियां करवा चुकी लीलाबाई कहती है कि मां बनने का जो सुख प्राप्त किया है। मेरी बालोतरा में इतनी बेटियां है जितनी किसी की नहीं। वे आकर मिलती है तो मुझे लगता है सबसे बड़ा कुनबा मेरा है। मेरे यजमानों की मदद से मैं यह कर रही हूं तो मैं उनकी शुक्रगुजार रहती हूं।

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