7 फ़रवरी 2026,

शनिवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

थार में जिन लोगों ने किया ऐसा काम, उनके नाम हो गया गांव, पढ़िए पूरी खबर

- 250 से अधिक गांव वहां जहां मिला पानी- तालाब, कुएं और पार तलाशने वाले व्यक्ति और समुदाय के नाम है गांव

2 min read
Google source verification
barmer news, water well

बाड़मेर. रेगिस्तान के धोरों में दूर-दूर तक पानी के लिए लोग किस तरह भटके और जीवन में पानी कितना महत्वपूर्ण है इसकी तस्वीर सौ-दो सौ साल बाद भी लोगों के जहन में जिंदा है। जिले में करीब ढाई सौ गांव उसी व्यक्ति के नाम से बसे हैं जिसने पानी खोजकर वहां लोगों को बसने का अवसर दिया। गांव बसने के बाद सातवीं और आठवीं पीढ़ी के लोग आज भी उसी जगह पर खोजे गए पानी को पी रहे हैं।

जिलेकी रामसर, गडरारोड, शिव और चौहटन तहसील में गांवों के नाम अभे का पार, करीम का पार, खलीफे की बावड़ी, समद का पार आदि है। कहीं रामसर, रत्तासर, बींजासर, कानासर तो कहीं पर गुमाने का तला, सुथारों का तला, टाकूबेरी, बगते की बेरी है। ढाई सौ गांवों के नाम के पीछे लगे बेरी, कुआं, तालाब, तला, नाडी और पार यहां के जलाशयों को दर्शाते हैं।

पानी खोजना बड़ी बात
तत्कालीन सिंध से जुडे़ परिवारों ने पानी की तलाश के लिए रेगिस्तान में एेसी जमीन ढूंढी जो रेगिस्तान की गोद में और समतल थी। इस जमीन में छोटी-छोटी बेरियां बना पानी निकाला। इनको पार कहा जाने लगा। जिस व्यक्ति ने यह पार तलाशे थे उसके या उसके परिवार के मुखिया के नाम से ही इसके आसपास परिवार बसा और फिर उसी के नाम से गांव हो गया। ये पार आज भी रेगिस्तान में पानी के स्थानीय स्रोत हैं। कोई अन्य विकल्प नहीं होने से आज भी इन्हीं पार से पानी मिलता है।

राजा सगर के जमाने के कुएं
जनश्रुति है कि भिंयाड़, सुथारों का तला, रामसर कुआं सहित कई गांवों में राजा सगर के जमाने के कुएं हैं। तीन से पांच सौ फीट गहरे इन कुओं को जिसने भी खोदा उस जाति समूह या व्यक्ति के नाम से गांव बसे हैं। इन कुओं से बरसों तक पानी आपूर्ति होती रही है। नाडी और तालाब के नाम से भी कई गांव हैं।

पालीवालों का उम्दा वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम
जैसलमेर के प्रसिद्ध कुलधरा गांव छोड़कर आए पालीवाल कुछ समय बाड़मेर के आसपास रुके। यहां पालीवालों ने कवास, उत्तरलाई, बांदरा और इसके आसपास उस जमाने में वाटर हार्वेस्टिंग का एक एेसा उम्दा सिस्टम तैयार किया जो दांतों तले अंगुली दबवाता है। तीन तरफ से पहाडि़यों का पानी आकर यहां से बहता है। यहां 108 तालाब बनाए हुए हैं। इन तालाबों में एक-एक कर पानी भरता है और जब सारे तालाब भर जाते हैं तो यह पानी लूनी नदी तक बह जाता है। यहां पर भी जिसने नाडी खुदाई में सहयोग किया उस जाति, समूह या व्यक्ति के नाम से नाडी का नाम रखा गया।

पानी तलाशना थी बड़ी बात
रेगिस्तान में पानी तलाशना बड़ी बात थी। फिर जहां पानी मिला वहीं लोग बसे ताकि इसके परिवहन में सुविधा रहे। उस स्थान को उसी परिवार व व्यक्ति के आवास के रूप में जाना जाने लगा और कालांतर में गांव हो गया। आज भी यहां उन्हीं के नामों से गांव हैं।- कमलसिंह राणीगांव,व्याख्याता

पानी के लिए था बड़ा संघर्ष
मीलों सफर करने पर भी पानी मिल जाता तो मानों जिंदगी मिल जाती। फिर रेगिस्तान में पानी का अन्य कोई स्रोत नहीं था। जिसने पानी तलाश लिया वो तो मानो भगवान हो गया। एक तरह से वो पानी का मालिक माना जाता था। उसके नाम से ही गांव की बसावट इसलिए होती कि वही उस परिवार का मुखिया होता था।- अचलाराम चौधरी, सुथारों का तला