
rajghat barwani
बड़वानी. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि के नाम से प्रसिद्ध राजघाट का नाम पूरे जिले सहित प्रदेश में मशहूर था। गांधीवादी विचारकों ने बापू के अस्थि कलश को यहां नर्मदा किनारे कुकरा में स्थापित किया था। तब से कुकरा को राजघाट के नाम से जाना जाने लगा। दिल्ली के बाद देश का एकमात्र राजघाट जिला मुख्यालय के समीप स्थित है। हालांकि सरदार सरोवर बांध की डूब आने के बाद राजघाट में बापू का समाधि स्थल भी डूब जाता था। डूब आने के बाद प्रशासन ने नर्मदा तट से बापू के अस्थि कलशों को निकालकर कुकरा पुनर्वास स्थल में शिफ्ट कर दिया। यहां बापू की समाधि भी सुसज्जित कर उसे विकसित कर दिया, लेकिन बापू के नाम से जो पहचान डूब गांव राजघाट रखता था, उसकी पहचान अब धूमिल हो चुकी है।
डूब आने के पूर्व राजघाट में प्रतिदिन कई लोग बापू की समाधि तक जाते थे और बापू को नमन करते थे। डूब आने के बाद राजघाट जलमग्र हो गया और लोगों का यहां आना-जाना लगभग बंद हो गया। इसके बाद से बापू की समाधि पर पहुंचने वाले लोगों की संख्या भी बहुत कम हो गई है। अब महात्मा गांधी की समाधि पर उनकी पुण्यतिथि और जयंती पर आयोजनों के दौराना लोग पहुंचते हैं। बांध के बैक वाटर की डूब ने बापू की पहचान भी छीन ली है।
इधर मचान पर बैठी है गांधीजी की प्रतिमा
धार जिले के डूब गांव चिखल्दा में बस स्टैंड पर वर्षों पुरानी महात्मा गांधी की प्रतिमा सरदार सरोवर बांध के बैक वाटर में डूब जाती थी। डूब गांव के लोगों ने प्रतिमा को डूबते देख बापू की प्रतिमा को बैक वाटर से ऊपर लेवल पर कर उसे एक मचान पर विराजित कर दिया है। डूब गांव के लोगों ने बापू की प्रतिमा को डूबने से बचाने के लिए ये जतन किया है। डूब प्रभावित गांव के इन लोगों का संघर्ष आज भी जारी है।
Published on:
02 Oct 2020 03:20 am
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