
बीहड़ में गुजारे 49 दिन, डाकुओं से मुठभेड़ कर बचाई 8 जनों की जान
जमवारामगढ़ (जयपुर). वर्ष 2006 में राजाखेड़ा से 8 जनों का डकैतों द्वारा अपहरण के बाद बीहड़ में डाकुओं से मुठभेड़ याद करके आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। मुठभेड़ में किसी की भी जान जा सकती थी। यह कहना है वर्ष 2015 बैच के आरपीएस व जमवारामगढ़ पुलिस उपाधीक्षक लाखन सिंह मीना का। पत्रिका ने जब उनसे सीधी बात की तो इसके अलावा भी उन्होंने जीवन के कुछ अनछुए पहलु बताए। उन्होंने बताया कि 49 दिन तक बीहड़ में तलाशी के बाद मुठभेड़ हुई और सभी आठ बंधकों को बचा लिया गया था। ये वाकया उन्हें आज भी याद है। प्रस्तुत है मीना से बातचीत के कुछ अंश....
किसान परिवार से इस मुकाम तक पहुंचे...
डीएसपी मीना अलवर जिले के लक्ष्मणगढ़ तहसील के बडौदा मेव थाना इलाके के चिमनपुरा गांव के रहने वाले हैं। पिता मूल्याराम मीना किसान व मां नत्थी देवी महिला गृहणी थी। सामान्य किसान परिवार से तालुक रखने वाले लाखन ने बीएड करने के बाद 1996 में पुलिस उप निरीक्षक के रूप में चयन होने के बाद सेवाएं प्रारम्भ की। मीना को वर्ष 2006 में पुलिस निरीक्षक पद पदोन्नति मिली। भरतपुर व धौलपुर जिले में 9 वर्ष तक सेवाएं दी।
उनसे पूछे गए सवालों के जवाब....
कार्य के दौरान प्राथमिकता क्या रहती है....
-पीडित पक्ष की सुनवाई करना प्राथमिकता रहती है। पीडा क्या है ओर किस तरह से सहायता की जा सकती है। इस पर विचार करके पीडित को कानूनी रूप से न्याय दिलवाना प्राथमिकता रहती है। दुर्घटना में घायलों क ो अस्पताल तक पहुंचाकर जान बचने पर बेहद सुकून मिलता है।
जन समस्याओं का समाधान कैसे करते है?...
-हर कोई अपना पक्ष सही बताता है। दोनों पक्षों का आमने सामने बिठाने के साथ निष्पक्षता से जांच करने से अधिकांश मामलों का समझाइश व सहमति से समाधान हो जाता है। कार्य में निष्पक्षता व ईमानदारी का अभाव रहने पर समस्या का समाधान नहीं हो पाता है।
पुलिस उपाधीक्षक कार्यालय के लिए क्या योजना है?...
-पुलिस उपाधीक्षक कार्यालय के लिए जेडीए से जमीन आवंटन का प्रयास है। पुलिस उपाधीक्षक कार्यालय थाने के क्वार्टर में चल रहा है। पुलिस उपाधीक्षक कार्यालय के पास स्वयं का भवन व अधिकारियों व कर्मचारियों के लिए आवास की सुविधा बेहद आवश्यक है। कार्यालय थाना परिसर में रहने से थाने की कई शिकायतें नहीं आ पाती है।
ये मुकाम कैसे हासिल किया...
-बीए करने के बाद बीएड करके शिक्षा के क्षेत्र में जाने का मन था। इस दौरान 1996 में पुलिस उप निरीक्षक की भर्ती आ गई। किसान के घर में पला बडा होने से कद काठी अच्छी थी। परीक्षा में सफ लता के बाद साक्षात्कार व शारीरिक दक्षता में भी सफ लता के बाद सब इंस्पेक्टर की नौकरी में आ गया। पुलिस में आने के बाद दूसरी सेवा में जाने का मन ही नहीं हुआ।
आपकी नजर में सबसे बड़ी जिम्मेदारी ?...
कानून व्यवस्था की पालना पुलिस की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। कानून व्यवस्था फैल नहीं हो इस पर सबसे अधिक फोकस रहने के साथ पीडित को न्याय मिले और अपराधी ओर दोषी को कानून सजा दे। तब जाकर ही पुलिस का जनता के बीच इकबाल रहेगा।
नौकरी व परिवार के बीच सामंजस्य कैसे बिठाते है...
पुलिस की नौकरी में हमेशा अनिचिश्चिता रहती है। कब ड्यूटी पर जाना है ओर कितना समय लगेगा। यह सब परिस्थिति पर निर्भर करता है। परिवार को समय कम ही दे पाते है। इसकी शिकायत भी रहती है। लेकिन परिवार जिम्मेदारी समझ जाता है और अपने आप को हमारे अनुरूप ढाल लेता है।
कभी किसी तरह का दबाव रहा....
पुलिस सेवा के दौरान कार्य करना चुनौती भरा है। बशर्ते कार्य पूरी ईमानदारी व निष्पक्षता करें। ईमानदारी व निष्पक्षता से काम करने पर कोई भी दबाव काम नहीं कर पाता है। निष्पक्षता के अभाव में ही दबाव आता है। मेरे सामने कभी ऐसी चुनौती नहीं आई।
युवाओं को संदेश...
आजकल युवा सफ लता प्राप्त करने के लिए शार्टकट रास्ता अपनाते है। शार्टकट से तात्कालिक सफ लता मिलती है। जीवन में सफ ल होने के लिए ईमानदारी से लक्ष्य प्राप्ति के लिए तन मन से मेहनत करने पर सफ लता जरूर मिलेगी। युवा नशे की ओर नहीं जाए। नशा स्वास्थ्य के साथ परिवार व समाज को खोखला करता है।
Published on:
15 Mar 2020 04:50 pm
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