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कुम्भकारों की नई पीढ़ी कला से बना रही दूरी, आधुनिकता ने मिट्टी की दीपकों की रोशनी को किया कमजोर

माटी की कला हो रही विलुप्त

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बस्सी

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Vinod Sharma

Nov 01, 2018

diwali deepak

कुम्भकारों की नई पीढ़ी कला से बना रही दूरी, आधुनिकता ने मिट्टी की दीपकों की रोशनी को किया कमजोर

कोटपूतली(जयपुर)। त्योहारों में फैशन व आधुनिकता की झलक ग्रामीण क्षेत्र में सदियों से चली आ रही माटी की कला को कमजोर कर रही है। दीपावली पर मिट्टी के दीपक जलाने व इससे बनी वस्तुओं के प्रति रूझान कम होने से कुम्भकारों की नई पीढ़ी इस कला से किनारा कर रही है। इसलिए यह कला विलुप्त होने के कगार पर है। लेकिन इसके बाद भी दीपावली पूजन की संस्कृति व रिवाज मिट्टी से बने दीपों और मूर्तियों के बिना अधूरे हैं। इनको बनाने में लगा कुम्हार समाज मंदी के अलावा मिट्टी के भाव को लेकर परेशान है। पहले गांवों से मिट्टी मिल जाती थी लेकिन अब खरीदनी पड़ती है। कस्बे में एक दर्जन से अधिक परिवार इस व्यवसाय में जुटे हुए है।

उनके घर में भी होगा उजाला
लोगों के घर रोशन होंगे तो उनके घर में भी उजाला होगा और रौनक रहेगी। इन परिवारों में मिट्टी से दीपक, कलश सहित अन्य वस्तुएं तैयार करने का काम चल रहा है। पहले मिट्टी के बर्तन दूसरे काम में भी लिए जाते थे लेकिन आधुनिकता के चलते स्टील, क्रॉकरी, सिल्वर व नॉन स्टिक बर्तनों की मांग बढ़ गई है। ऐसे में मिट्टी से जुड़े परिवारों के लिए रोजी रोटी का संकट पैदा हो गया है। दीपावली पर मिट्टी के दीपक अन्य सामान की बिक्री होती है। इससे ही साल भर की कमाई होने की उम्मीद रखते है और इस काम में जुटे हुए है।

ऐसे बनते है मिट्टी के बर्तन व दीपक
बुजुर्ग कुम्भकार बालूराम ने बताया कि बाहर से लाई गई मिट्टी का पहले साफ करके इसका बारिक किया जाता है। इसे पानी में कई घंटों तक रौंद कर भिगोया जाता है। इसके बाद चाक पर चढ़ाकर हाथों से दीपक, गमले, गुल्लक, कलश व मटके का रूप दिया जाता है। मिट्टी के बर्तनों को धूप में सुखाया जाता है और आग में कई घंटों तक पकाया जाता है। ठंडा होने पर बर्तनों का रंग बिरंगी रंगों से डिजाइन बनाकर सुंदर बनाया जाता है इसके बाद बिक्री के लिए भेजा जाता है।

बाहर से खरीदनी पड़ती है मिट्टी
कुम्भकार राजेशकुमार व दुलीचंद ने बताया कि पहले शहर में मिट्टी मिल जाती थी इसकी कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती थी लेकिन अब मिट्टी का मोल भाव होने लगा है। पहले शहर के बाहर खेत होते थे जहां से मिट्टी मिल जाती थी लेकिन अब कॉलोनी बसने से 2 से 3 हजार रुपए प्रति ट्रॉली खरीदते है।

पर्यावरण होगा शुद्ध
लोग मिट्टी से बने दीपक, प्रतिमाएं, व अन्य सामान का उपयोग करें तो इससे पर्यावरण शुद्ध होगा और कुम्भकारों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी। यहीं नहीं मिट्टी के दीपक से पूजा करने पर लक्ष्मी प्रसन्न होती है। दीपावली पर्व पर मिट्टी के दीपक जलाकर अपने घरों को रोशन करे और कुम्भकारों के घरों में भी रोशनी पैदा करे।

दिहाड़ी जितनी भी नहीं होती कमाई
युवा कुम्भकार हजारीलाल व हीरालाल ने बताया कि दैनिक मजदूरी करने से प्रतिदिन 350 से 400 रुपए की आमदनी हो जाती है। लेकिन इससे इतनी भी कमाई नहीं होती है। इसलिए कुम्भकार समाज के युवाओं में इसके प्रति रूझान नहीं है। बुजुर्ग ही इस व्यापार का चला रहे है। इस समाज के अधिकतर मार्बल फिटिंग, मजदूरी व निजी नौकरी सहित अन्य कार्यों से जुड़ रहे है। अभी मिट्टी के दीपक एक रुपए प्रति नग के हिसाब से विक्रय हो रहे है।