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भूल तो नहीं गए कोरोना से बचाने वाले रक्षकों को?

देश ने वर्ष 2020 और 2021 में कोरोना की दो मारक लहरें झेली और उन ग्राउंड पर खड़े कोरोना वायरस की मदद से इस महामारी को न सिर्फ पीछे धकेला, बल्कि इससे निजात भी काफी हद तक हासिल कर ली। मगर इसमें बड़ी संख्या में लोगों को कोरोना वायरस से जान भी गंवानी पड़ी।

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भूल तो नहीं गए कोरोना से बचाने वाले रक्षकों को?

भूल तो नहीं गए कोरोना से बचाने वाले रक्षकों को?

जयपुर। देश ने वर्ष 2020 और 2021 में कोरोना की दो मारक लहरें झेली और उन ग्राउंड पर खड़े कोरोना वायरस की मदद से इस महामारी को न सिर्फ पीछे धकेला, बल्कि इससे निजात भी काफी हद तक हासिल कर ली। मगर इसमें बड़ी संख्या में लोगों को कोरोना वायरस से जान भी गंवानी पड़ी।

राजस्थान के सांचौर शहर में तजग रेबारियों का गोलिया स्कूल में अध्यापक पद पर कार्यरत स्व. श्रवण कुमार कोरोना की पहली और दूसरी लहर में ग्राउंड कोविड टास्क का हिस्सा थे, जिनका कार्य संक्रमण फैलने से रोकना था। संदिग्धों की पहचान करना, उन्हें क्वारंटाइन करना और चिकित्सा सेवा प्राप्त करने में सहायता करना उनके कार्यों का प्रमुख हिस्सा था, लेकिन अफसोस कि लोगों को बचाते हुए वो खुद को संक्रमित होने से न बचा सके और 2 वर्ष पहले 6 मई 2021 को 'वीरगति' को प्राप्त हो गए थे।

परिवारजनों ने बताया कि जब उन्हें समझाया जाता 'आपको ये ड्यूटी करने की जरूरत नहीं है, आपकी 56 वर्ष की उम्र हो गई है, आप एप्लीकेशन देंगे तो छुट्टी मिल जाएगी। तो जवाब में वो बस एक ही बात कहते 'अब सब बहाना बनाकर छुट्टी ले लेंगे तो कोरोना को कौन रोकेगा?'

वर्ष 1993 में सांचौर शहर में बतौर शिक्षक कदम रखते समय किसी ने सोचा नहीं था कि जब कोरोना वॉरियर स्व. श्रवण कुमार यहां रहना शुरू करेंगे तो न सिर्फ अपना पूरा जीवन यहां के बच्चों को शिक्षा देने में लगा देंगे, बल्कि अपनी अंतिम सांस भी वो इसी शहर के लोगों को बचाते हुए न्यौछावर कर देंगे।