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चूहे का शिकार आज भी है आदिवासियों का खास शगल

चूहे का शिकार करना आज भी बस्तर में आदिवासियों का खास शगल बना हुआ है। यह इनका लजीज और जायकेदार व्यंजन है, जिसे सपरिवार बड़े चाव से खाते हैं।

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Ajay Shrivastava

Mar 14, 2016

important tribal pastime

Rat hunt is still important tribal pastime

जगदलपुर.
आपने कभी चूहे को देखकर उसका शिकार करने के लिए सब काम छोड़कर किसी को घंटों तक मशक्कत करते देखा है।


सपरिवार बड़े चाव से खाते हैं

दरअसल चूहे का शिकार करना आज भी बस्तर में आदिवासियों का खास शगल बना हुआ है। यह इनका लजीज और जायकेदार व्यंजन है, जिसे सपरिवार बड़े चाव से खाते हैं।


संभाग मुख्यालय से 5 किमी दूर घाटपदमूर में रहने वाले रूपा धुरवा और लखु आर्थिक रूप से कमजोर है, जो पीढिय़ों से इस परम्परा को शिद्दत से निभा रहे हैं। वे सब्जी, भाजी भी खाते हैं लेकिन चूहे का शिकार आज भी इनका मन बहलाने के लिए और प्रिय भोजन भी है। रूपा धुरवा ने बताया कि वे 20 साल पहले ओडिशा के भोड़ीनाल से माता-पिता के साथ घाटपदमूर में बस गए।


पीढिय़ों से चला आ रहा चूहे खाने का सिलसिला

उनके पूर्वज जंगल में रहते थे और धुरवा जनजाति के थे, जो चूहे, मेंढक और चिडि़या पकड़कर खाते थे। पहले आदिवासी पारद (सामूहिक शिकार) के लिए जाते थे और शाम को लौटकर जो भी मिला उसे पकाकर खाते थे। सरकारी प्रतिबंध और माओवाद की वजह से वे पारद तो नहीं जाते लेकिन आसपास के घरों और खेतों में चूहे मारकर खाते हैं। गांव में ही भतरा जाति के लोगों में भी कुछ एसी ही परंपरा है।


ऐसे पकड़ते हैं चूहे

रूपा धूर्वा के जीजा लखु ने बताया कि मान लो खेत में दो बिल है। वे एक बिल को बंद करके उसमें आग जलाकर धुआं छोड़ते हैं। इससे चूहों में घुटन होती है और वे समूह में बाहर निकलते हैं, जिसे हम पकड़ लेते हैं। लखु ने बताया कि बचपन से वे ये सब खा रहे हैं, लेकिन आज तक वह और उनका परिवार स्वस्थ है।


कुछ समय से सांप खाना बंद

रूपा धुरवा ने बताया कि वे पहले सांप भी खाते थे, लेकिन अब पारिवारिक कारण से इसे खाना बंद कर दिया है। उन्होंने बताया कि उनके तीन बच्चे भी है जो चूहे, केकड़ा, मेंढ़क को बड़े चाव से खाते हैं।