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बस्ती. सूबे में पटरी से उतर चुकी स्वास्थ्य सुविधाओं की बेहतरी के सरकारी दावे महज दावे सिद्ध हो रहे हैं। बात चिकित्सकों की प्राइवेट प्रैक्टिस की करें या अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता की, हालात बदतर ही हैं। अन्य जिलों की कौन कहे, प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह के प्रभार वाले जिले में ही धडाम हो चुकी है। हालात इतने बदतर हैं कि चिकित्सक रात के समय इमरजेन्सी में उपचार कराने पहुंचने वाले मरीजों का इलाज टॉर्च की रोशनी में करने को मजबूर हैं। हम बात कर रहे हैं जिले के कप्तानगंज सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की।
कप्तानगंज सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर रात को अगर कोई ईलाज कराने के लिए पहुंच जाए तो उसके लिये उपचार कराना जंग लड़ने से कम नहीं। रात होते ही अस्पताल में अंधेरे का साम्राज्य स्थापित हो जाता है। रोशनी के लिये अस्पताल पूरी तरह से निर्भर है। कहने के लिए जेनरेटर उपलब्ध है, लेकिन वह भी महज दिखाऊ शाह की डाल बनकर रह गया है। जब देर रात बिजली गुल हो जाती है, तब अस्पताल परिसर कालिमा में डूब जाता है। अस्पताल के वार्ड से लेकर आपातकालीन कक्ष तक अंधेरे का राज होता है। अस्पताल में उपचार के लिये भर्ती मरीजों की देख-रेख के लिये साथ रूकने वाले मरीजों के तीमारदार मोमबत्ती के सहारे किसी तरह समय काटते है। इंतजार करते है कि कब बिजली आ जाए। जब तक बिजली नहीं आती तब तक तीमारदारों की सांसे अटकी रहती हैं।
भयग्रस्त रहते हैं तीमारदार
मरीजों के साथ रहने वाले तीमारदार बिजली कटने से लेकर आने तक भयग्रस्त रहते हैं। उनको हर समय यह भय सताता रहता है कि बिजली आने से पहले उनके मरीज की हालत कहीं बिगड़ ना जाए। अंधेरे में जब वार्ड से बाहर निकलने में भी डर लगता है, ऐसे में यदि कुछ हुआ तो वह किस तरह चिकित्सकों तक सहयोग के लिए पहुंच पाएंगे। मरीजों के परिजनों का कहना है कि बिजली कटने पर अस्पताल प्रशासन रोशनी का कोई प्रबंध नहीं करता।
बिजली के साथ गुल हो जाते हैं स्वास्थ्यकर्मी
परिजनों ने आरोप लगाया कि बिजली गुल होते ही चिकित्सकों के साथ ही अन्य कर्मचारी भी गायब हो जाते हैं। अस्पताल परिसर में केवल मरीज एवं उनके परिजन ही रह जाते हैं। यह हाल केवल कप्तानगंज अस्पताल का ही नहीं, कमोबेश जनपद के ग्रामीण इलाकों के प्रत्येक अस्पताल का है।
सतीश श्रीवास्तव
Published on:
21 Dec 2017 08:19 pm
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