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वृद्धा आश्रम में तिल- तिल कर मरने को मजबूर बुजुर्ग, सुविधा देने के नाम पर ठगी कर रहे एनजीओ संचालक
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वृद्धा आश्रम में तिल- तिल कर मरने को मजबूर बुजुर्ग, सुविधा देने के नाम पर ठगी कर रहे एनजीओ संचालक

बुजुर्गों की सेवा के लिए आश्रमों को मोटी रकम दी जाती है, मगर एनजीओ संचालक इन रूपयों को अपनी कमाई का जरिया बना चुके हैं।

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सतीश श्रीवास्तव

बस्ती. सरकार के तमाम प्रयासों के बाबजूद देश भर में बुजुर्गों की हालत को लेकर खासा सुधार नहीं देखने को मिल रहा है। देश के 30 फीसदी से ज्यादा बुजुर्गों को अपने परिवार के सदस्यों के अपमान और गालीगलौज झेलना पड़ता है । अपनों के सताये इन बुजुर्गों को सहारा देने के लिए कई वृद्धा आश्रम भी बनाये गये हैं, मगर इन जगहों पर इनके साथ अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है । हर माह सरकार से इन बुजुर्गों की सेवा के लिए इन आश्रमों को एनजीओ के माध्यम से मोटी रकम दी जाती है, मगर एनजीओ संचालक इन रूपयों को अपनी कमाई का जरिया बना चुके हैं।


कड़ाके की ठंड मे बस्ती के एक वृद्वा आश्रम में रहने वाले बुजुर्गो की हालत बेहद दयनीय है। एनजीओ के माध्यम से चल रहे इस आश्रम की पोल तब खुली जब मीडिया की टीम वहां पहुंची। सरकार से हर माह लाखों रुपये वसूल रहे एनजीओ संचालक बुजुर्गो को सुविधा के नाम ठग रहे हैं। कई साल पुराने कंबल और रजाई देकर बेसहारा बुजुर्गो को यहां और बीमार बनाया जा रहा है, हालात ऐसे है कि अब तक किसान सेवा संस्थान के नाम से चल रहे इस वृद्वा आश्रम मे तीन बुजुर्गो की इलाज के अभाव मे मौत भी हो चुकी है जबकि कई बुजुर्ग अब भी बीमार है और उन्हें सही तरीके से इलाज नहीं मिल पा रहा है।

इतना ही नहीं एनजीओ हाउस के नाम पर सरकार से 80 हजार रुपये लेते हैं जबकि मकान मालिक को महज तीस हजार रुपये ही दिये जा रहे है। वहीं मकान मालिक ने बताया कि मार्च से ही एनजीओ का अनुबंध समाप्त हो चुका है मगर अभी भी उनका कब्जा बना हुआ है और वे सरकार से धन वसूल भी रहे हैं। कुछ बुजुर्गो ने बताया कि मीनू के हिसाब से उन्हें खाना तो मिलता है मगर अन्य सुविधा नहीं मिलती । एक बड़े से हॉल में सभी को एक-एक बेड दिया गया है, वहां ठंड से बचने के कोई उपाय नही है। कंबल के नाम पर तो गंदे रजाई थमा दिये गये हैं जो नाकाफी साबित हो रहे हैं।

स्टोर चेक करने पर जो जानकारी सामने आई उसके मुताबिक इन आश्रमों में खाने के लिये पर्याप्त मात्रा में राशन ही नही है। एनजीओ के लोगों की मौजूदगी मे डरवश बुजुर्ग अपना दर्द बयां नही कर पा रहे थे लेकिन एक बुजुर्ग ने बताया कि एक बुजुर्ग पर 1795 रुपये हर माह वसूलने वाले संचालक ठीक तरह से इन्हें खाना तक नही देते, कई साल पुराने रजाईयो से आज भी काम चलाया जा रहा है और दवा के नाम पर सरकारी अस्पताल में दवा दिला दिया जाता है ।

इल वृद्धाश्रम में 42 बुजुर्गो की पंजीकरण है और 20- 25 यहां मौजूद थे। इस वृद्धा आश्रम में आज तक कोई भी प्रशासनिक अधिकारी नहीं आया जिसका फायदा उठाकर एनजीओ संचालक बुजुर्गो के नाम पर भी गडबड़झाला कर रहा है । वहीं एनजीओ की पोल पट्टी खुलने पर संचालक का कहना था कि सभी बुजुर्गो की देखभाल की जाती है और पुराने रजाई को जल्द बदल दिया जायेगा और ठंड से बचने के लिये कंबल का इंतजाम किया जा रहा है।

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