
नींबू को शनि की दृष्टि, आम में राहत, कटहल कमजोर ( Photo - Patrika)
Bemetara district: राकेश तिवारी. पडक़ीडीह नर्सरी से हर साल हजारों पौधे प्रसाद की तरह वितरित किए जाते हैं इसके बाद भी चालीस ऐसे गांव नहीं बन पाए जहां पर फलदार पेड़ हो या फलों के उत्पादन में अग्रसर हो। शुरुआती वर्षों में अमरूद बेर को लेकर लोगों में रुझान दिखा, फिर बाद में लोग ध्यान ही नहीं दिए। बेमेतरा जिले में उद्यानिकी विभाग के चार नर्सरी चारों ब्लाक में है। इस लिहाज से किसी एक फल में जिले की आत्मनिर्भरता हो जानी थी। हर साल लाखों खर्च कर पौधा रोपण का महाअभियान तो चलाया जाता है पर जमीन में इसका प्रभाव शून्य है।
राज्य बनने के समय कई मामलों में छत्तीसगढ मध्यप्रदेश के मुकाबले अधिक सक्षम था। बिजली वपानी दोनों में छत्तीसगढ बेहतर स्थिति में था। मध्यप्रदेश में जमीन में काम हुआ दोनों में सुधार हुआ। छत्तीसगढ में हवा में काम हुआ। दोनों मे आज वह स्थिति नहीं जो जन्म के समय था। धान व चावल की राजनीति ने न केवल संयुक्त परिवार को राशन कार्ड के सहारे तोड़ा बल्कि पूर्वजों के उन बगीचों को उजाड़ दिया।
जिससे गांव को सीजन में फल व आसपास के गांव में पूर्वजों के नाम के बगीचा विरासत में मिलता था। गांव से गायब होते बगीचा को नई पीढ़ी बचाने उत्सुक नहीं है। गांव के छांव में जिनकी जिंदगी बीती वे कहते हैं कि ऐसी, पेशी व देशी शरीर तोड़ देती है सुकून चाहिए तो बगीचा चले जाएं जहा पत्ते, फूल व पक्षी पीड़ा हर लेते हैं।
बेमेतरा जिले में उद्यानिकी विभाग का सबसे पुराना नर्सरी पडक़ीडीह में इन दिनों आम के पेड़ फल से लदे हैं। एकांतर फल के बाद भी इस नर्सरी में आम की औसत उत्पादन राहत भरी है। कुछ कटहल के पेड़ है जिसमें फल तो लगते हैं पर उम्मीद से कम है। यदि नर्सरी का इतिहास देखा जाए तो इसकी आयु चालीस साल से अधिक है।
शनि के दुष्प्रभाव को रोकने या नकारात्मक ऊर्जा से बचने हर शनिवार को देश में बड़ी संख्या में व्यापारी दुकानों में नींबू मिर्च लटकाते हैं। यदि नींबू को शनि देव का कोप भाजन होना पड़े तो क्या लटकाए यह मेटा या गुगल नहीं बता नही पा रहे हैं। राज्य बनने के पच्चीस साल बाद स्थिति यह की आज आम बाजार में नींबू पांच रुपए प्रति नग में बिक रहा है। नींबू अपने प्रचूर औषधि गुणों के साथ-साथ आम लोगों के दैनिक जीवन में उपयोगी है।
सलाद, आचार, शरबत, स्किन केयर, हेयर केयर व सफाई सहित दर्जनों उपयोग है जो मानव सभ्यता के साथ-साथ होते आया है। नींबू, मोरेंगा यानि मुनगा, सीताफल के उत्पादन में हरेक गांव की सहभागिता जब तक नहीं होगी तब तक नींबू गरीब को नसीब नहीं होगा। छग राज्य के स्वप्न दृष्टा पूर्व सांसद चंदूलाल चंद्राकर अपने प्रवास में आम लोगों को परंपरागत फलों व सब्जी उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करते थे। आज उनकी सोच की सच्चाई समझ आ रही है। यदि उनकी बात मान ली गई होती तो बाड़ी में फलदार पेड़ जरूर होते।
Updated on:
11 Apr 2026 06:24 pm
Published on:
11 Apr 2026 06:23 pm
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