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अब कालीन उद्योग पर मंदी की मार, कम हुए ऑर्डर, डिमांड भी घटी

कालीन निर्यातकों की गुहार, मदद करे सरकार, वर्ना बुनकर होंगे बेरोजगार।

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Carpet Industry

प्रतीकात्मक फोटो

भदोही. मंदी की मार से भदोही का विश्व प्रसिद्ध कालीन उद्योग भी अछूता नहीं रहा है। लाखों लोगों को रोजगार देने वाले इस उद्योग पर भी मंदी का असर साफ दिखायी दे रहा है। मंदी के चलते कारपेट इंडस्ट्री के ऑर्डर में कमी आयी है। इसके अलावा कालीनों की डिमांड घटने से भी कारपेट कंपनियों को नुकसान हो रहा है। स्थानीय लोगों का दावा है कि ऐसे ही हालात रहे तो इस इंडस्ट्री से बड़ी संख्या में बुनकरो का पलायन हो सकता है। तमाम चुनौती से जूझ रहा कालीन उद्योग सरकार की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है।

बीते साल भारत से कारपेट इंडस्ट्री ने 10 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का एक्सपोर्ट किया था। इसमें अकेले 60 परसेंट एक्सपोर्ट भदोही परिक्षेत्र से किया गया था। ऑर्डर के उपलब्धता के चलते इंडस्ट्री में मांग का फायदा बुनकरों को भी मिला और कई जिलों से आए बुनकरों को यहां रोजगार मिला, पर अब मंदी के असर के चलते हालात बदल गए हैं। कारपेट एक्सपोर्टर संजय गुप्ता बताते हैं कि विदेशी बाजारों से भदोही के कालीन उद्योग को मिलने वाले ऑर्डर में कमी आयी है। इसकी सीधा असर बुनकरों पर पड़ेगा। ओंकारनाथ मिश्रा ने कालीन उद्योग पर पड़ने वाले मंदी के असर से निपटने के लिये सरकार को गंभीरता से विचार करने की सलाह दिया। उन्होंने कहा है कि उद्योग को सरकार से उम्मीदें हैं। कारपेट इंडस्ट्री में रोजगार पैदा करने की क्षमता है।

कभी ईरानियों से कालीन बुनयी की कला सीखने वाले भदोही के कालीन अब ईरान को टक्कर देते हैं। यहां के हस्त निर्मित मखमली कालीन विदेश में खूब पसंद किये जाते हैं और इसे लग्जरी आइटम में गिना जाता है। एक अंदाजे के मुताबिक कालीन उद्योग से 20 लाख बुनकरों की रोजी-रोटी जुड़ी हुई है। ऐसे में अगर इस पर मंदी का असर और हुआ तो बड़ी तादाद मे रोजगार जाएगा।

कालीन निर्यात एवं सम्वर्धन परिषद यानि सीईपीसी के अध्यक्ष सिद्धार्थनाथ सिंह ने बताया है कि मंदी की वजह से महंगी बिकने वाली हस्त निर्मित कालीनों की डिमांड पर बड़ा असर पड़ा है। मशीन मेड कालीनों का हाल ये है कि एक समय था, जब टर्की भारत से कालीन आयात करता था, लेकिन अब टर्की खुद एक्सपोर्ट कर रहा है। ऐसे ही बहुत से देश हैं जो मशीन मेड कालीनों का प्रोडक्शन अपने यहां कर रहे हैं। उन्होंने कहना है कि हस्तनिर्मित कालीनों की कम होती डिमांड और घटते ऑर्डर रोजगार पर असर डालेंगे।

कुछ साल पहले भी इसी तरह के हालात बने थे तब सरकार ने कारपेट इंडस्ट्री की मदद की थी और इस बार भी उद्योग सरकार की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है। बता दें कि देश में कालीन भदोही, जयपुर, बीकानेर, कश्मीर, पानीपत में भी कालीनें बनायी जाती हैं, लकिन भदोही, परिक्षेत्र के भदोही, वाराणसी और मिर्जापुर को इस का गढ़ कहा जाता है, अकेले 60 फीसदी से अधिक कालीन निर्यात यहीं से होता है। अब देखना यह होगा कि कारपेट इंडस्ट्री को मंदी के असर से बचाने के लिये सरकार क्या करती है, क्योंकि इससे इडस्ट्री के साथ-साथ बेरोजगारी की समस्या भी बढ़ेगी।

By Mahesh Jaiswal