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चाक निराश, हाथ हताश

पीली और काली मिट्टी की कमी से नहीं बना पा रहे देशी मटके, दूसरे शहरों पर आश्रित शहर के कुंभकार, रोजी-रोटी पर भी संकट, कई कुंभकारों ने पुश्तैनी कार्य से अब बनाई दूरी

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चाक निराश, हाथ हताश

चाक निराश, हाथ हताश

pots news bharatpur भरतपुर. गर्मियों में यदि कहीं मिट्टी का घड़ा रखा दिख जाए तो हमारी बांछे खिल जाती है और ठंडे पानी की आस हमें यहां खींच ही लाती है। आज भले ही आधुनिक युग में ठंडे पानी के लिए फ्रिज और वाटरकूलर आ गए हों, लेकिन देशी मटकों की बात ही कुछ और होती है। लेकिन इन मटकों को गढऩे वाले हमारे देशी इंजीनियर इन्हें बनाने में किन समस्याओं से जूझ रहे हैं। इससे किसी को कोई वास्ता नहीं होता। यही कारण है कि आधुनिकीकरण के इस युग में अब भरतपुर जैसे शहर में भी देशी घड़ा बनाने की पीली और काली मिट्टी की कमी होने लगी है। इसके चलते सदियों से मिट्टी के घड़े सहित अन्य उत्पाद बनाने वाले कुंभकार अब दूसरे शहरों से बने मिट्टी के बर्तनों पर आश्रित हो गए हैं।
इन दिनों शहर में अनेक चौराहों पर मटके बिक रहे हैं। लेकिन इन घड़ों में शहर का देशी घड़ा कहीं गुम हो गया है। अधिकतर जगह बिक रहे ये घड़े अहमदाबाद, जयपुर और सीकर सहित अन्य शहरों के हैं। शहर के कुंभकारों के अनुसार वर्तमान में शहर और उसके आसपास पीली और काली मिट्टी की उपलब्धता लगभग समाप्त हो गई है। इसके चलते अब उन्हें घड़ा बनाने में भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए अधिकतर कुंभकार अब गुजरात के अहमदाबाद और प्रदेश के जयपुर, सीकर से आ रहे मटकों पर आश्रित हैं और इन्हें ही बेच रहे हैं। ऐसे में कई कुंभकार आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण अब अपने पेशे से ही दूरी बना रहे हैं।
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कई बार बताई समस्या नहीं हुआ समाधान
प्रजापति विकास सेवा समिति भरतपुर के शहर अध्यक्ष सोहनलाल का कहना है कि मटका बनाने में काली और पीली मिट्टी का उपयोग होता है। यह मिट्टी चिकनी होती है। पहले शहर के कुछ इलाकों में मिट्टी मिल जाती थी और वे खोदकर ले आते थे। इसके अलावा कुओं और नलकूपों की खोदाई में भी चिकनी मिट्टी बाहर आती थी। लेकिन अब मिट्टी न मिलने से कुंभकार पेशे से दूरी बना रहे हैं। सोहनलाल ने बताया कि वे मिट्टी उपलब्ध करवाने की मांग को लेकर राज्यमंत्री डॉ. सुभाष गर्ग को भी मिलकर ज्ञापन दे चुके हैं। लेकिन उनकी समस्या पर सुनवाई नहीं हो रही।
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बाहर के मटके बेचना मजबूरी
शहर के कुंभकार ओमप्रकाश ने बताया कि मिट्टी के बर्तनों को बनाने वाली चिकनी मिट्टी की वर्तमान में शहर में उपलब्धता बहुत कम हो गई हैं। इसके चलते कुंभकार अब देशी मटकों को बनाने की बजाय बाहर के मटकों को बेचने पर जोर दे रहे हैं। हालांकि बाहर से मटके खरीदकर बेचने में उन्हें माल एक साथ लेना होता है। इसमें टूट-फूट की जिम्मेदारी भी उनकी होती है। दूसरा इन्हें खरीदकर बेचने के लिए अधिक पूंजी की जरूरत होती है। इसलिए कई कुुंभकार पुश्तैनी कार्य से दूरी बना रहे हैं।
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